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तुझे पा लिया……(सत्यम शिवम)

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तुमको कभी ऐसे पाऊँगा,
तुझमे ही मै खो जाऊँगा,
मर जाऊँगा,मिट जाऊँगा,
पर अब जुदा हो ना पाऊँगा।
मन के घनघोर बादलों पे,
जैसे छायी हो रात की कालिमा,
वैसे ही मै तुझमे समा के,
खुद को करुँगा लालिमा।

मेरी आत्मा,परमात्मा से,
मिल के जो सुख पायेगी,
मै कैसे कहूँ,क्या नाम दूँ,
शब्दों में कैसे व्यक्त करुँ?

उस मधुर मिलन की कामना।

जो बीत गया उसे भूल कर,
अंदर की आँख को खोल कर,
मन के दीपक की ज्योत जला,
तेरे चरणों में मन को लगा।

चाहूँगा मै तुझे ऐसे प्रभु,
जैसे मौत की शय्या पे पड़ा,
कोई चाहता हो जीने की लालसा।

चाहत मेरी ऐसे पूर्ण हो,
मधुबन में जैसे कोई जीर्ण हो,
हो लालसा मद्भाल की,
हो कामना बस प्यार की,
मधुशाला में भी जो रहे,
बन के प्याले की मद्लालसा।

अब तु रहेगा,मै रहूँगा,
और बस चाहत रहेगी,
तेरे साथ मै,मेरे पास तु,
बन के ख्वाहिश बस साथ चलेगी।

तु नैनों में बस जायेगा,
हर जगह तु ही नजर आयेगा,
हिन्दू भी तु,मुसलिम भी तु,
इसा भी तु कहलायेगा।

राजा भी तु,प्रजा भी तु,
शासित भी तु,शासक भी तु,
सुख दुख का सारा खेल तु,
सब भेदभाव मिट जायेगा।

मन स्वच्छंद उड़ता हुआ,
तब अपनी मँजील पायेगा।

सब को भूला,तु जो मिला,
बस तुझमे ही अब नेह लगा,
सब कष्ट मेरे अब मिट रहे,
जैसे पा लिया हो अमृत की थालसा।

तु साथ है,अब क्या प्यास है,
तु पास है,ये मेरी साँस है,
अब मै रहूँ तुझमे कहूँ,
तुझे पा लिया,तुझे पा लिया,
तुझको तो अब मै पा लिया। 

10 टिपण्णी:
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निर्मला कपिला said...
18 February 2011 at 6:03 AM  

जो बीत गया उसे भूल कर,
अंदर की आँख को खोल कर,
मन के दीपक की ज्योत जला,
तेरे चरणों में मन को लगा।

बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश दिया है सत्यम जी ने। धन्यवाद।

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प्रवीण पाण्डेय said...
18 February 2011 at 7:18 AM  

पूर्ण समर्पणीय आनन्द।

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राज भाटिय़ा said...
18 February 2011 at 7:55 AM  

वाह जी एक बहुत सुंदर ओर पुर्णतया समर्पित रचना, धन्यवाद

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डॉ. मनोज मिश्र said...
18 February 2011 at 2:22 PM  

सब को भूला,तु जो मिला,
बस तुझमे ही अब नेह लगा,
सब कष्ट मेरे अब मिट रहे,
जैसे पा लिया हो अमृत की थालसा।

बहुत सुंदर.

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अजय कुमार said...
19 February 2011 at 6:09 AM  

सार्थक संदेश ,बधाई

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Patali-The-Village said...
21 February 2011 at 3:04 AM  

पूर्ण समर्पणीय आनन्द। धन्यवाद|

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दिगम्बर नासवा said...
21 February 2011 at 7:06 AM  

राजा भी तु,प्रजा भी तु,
शासित भी तु,शासक भी तु,
सुख दुख का सारा खेल तु,
सब भेदभाव मिट जायेगा।

Sundar abhivyakti hai ... Uski sharan mein jaane se sab kuch apne aap hi mil jaata hai ...

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ज्योति सिंह said...
24 February 2011 at 6:27 PM  

जो बीत गया उसे भूल कर,
अंदर की आँख को खोल कर,
मन के दीपक की ज्योत जला,
तेरे चरणों में मन को लगा।
bahut sundar man ko chhoo gayi .

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...
6 June 2012 at 3:10 AM  

शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
सूचनार्थ

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:08 AM  

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