एक नयी जानकारी आप के फ़ायर बक्स के लिये..
यह मेरी इस ब्लांग पर शायद इस महीने की आखरी पोस्ट होगी, आज कल मन भटकता सा जा रहा है, पहले भारत जाता था तो दिल मै बहुत खुशी होती थी.... लेकिन इस बार दिल नही मान रहा..... लेकिन जाना तो जरुरी है.... क्यो कि यह दुनिया मेरे कामो के कारण या मेरे कारण तो नही रुकने वाली, ओर अगर मै रुक गया तो ... समय से पिछड जाऊगां....
जो मुझे पसंद नही....
अरे कहां से यह बात ले कर बेठ गया आप कॊ बताने तो लगा था , गुगल बाबा की नयी जानकारी, जी अगर आप फ़ायर बाक्स का इस्तेमाल करते है, ओर अपने पेज को अपनी पसंद के हिसाब से सुंदर, मन मोहक, मस्ताना, बनाना चाहते है या उसे सजाना चाहते है तो देर किस बात की, बस एक प्यारा सा चटका यहां लगाये, ओर पहुच जाये सजावट की दुकान पर, ओर मन पसंद सजावट तेयार है बिलकुल मुफ़त समय भी बस एक मिंट से कम, तो आप अब सजावट करे फ़िर बताये.
Saturday, January 23, 2010 | 25 Comments
पानी की टंकी यहां है जी....
अब कई भाई बंधुओ ओर बंधनियो ने पूछा है जी वी टंकी कहां है, हम भी चढना चाहते है उस पर, तो सज्जन ओर सजन्नियो आप को आदर से सुचित किया जाता है कि पुराने वाली टंकी लोहे की थी, जो जंगाल खा कर चर मरा गई थी, ओर हमारे कई ब्लांगर वहा से गिर कर जख्मी हो गये थे, ओर अब हमारी ब्लांगर कमेटी ने चंदा ईकट्ठा कर के यह नयी टंकी बनवानी शुरु की है, अभी काम चल रहा है.
आप सब को जान कर खुशी होगी की टंकी के ठीक नीचे हम ने ब्लांगर मीटिंग के लिये एक बडा हाल भी बनवाया है, ओर यह टंकी आधुनिक होगी यानी इस पर छत होगी ओर लिफ़्ट भी होगी, ओर सामाने ब्लांगर से बात करने के लिये मेदान मै भी एक वाताकुलिन खुली छत का कमरा होगा, ओर ऊपरे चढे ब्लांगर से बात करने के लिये वीरु ओर गांव वालो की तरह से चिल्लाना नही पडेगा, वल्कि माईक लगे होगे ओर हेड फ़ोन भी सभी को दिये जायेगे, ऊपर वाले ब्लागर को कोका कोला ओर पिज्जा भी दिया जायेगा, ओर जो उसे मनाने आयेगे उन्हे भी उन की पसंद का खाना दिया जायेगा, बिल वो देगा जो टंकी से उतरेगा.
बस टंकी का काम खत्म होने वाला है, जिन जिन ब्लांगरज ने अपनी जगह बुक करनी हो, कृप्या वो समय रहते अभी बता दे, नोट यह सुबिधा सिर्फ़ हिन्दी वाले ब्लांगरो को दी जा रही है,टंकी पर आप किसी भी मोसम मै चढ सकते है, अगर आप अपनी जगह लेकिन अपने नाम से किसी ओर को चढाना चाहे तो उस का इन्तजाम भी है, हम आप को दिहाडी पर आदमी देगे
तो ब्लांगर साथियो आप किसी गलत टंकी पर मत चढे, जहां कॊइ उतारने वाला ही ना हो, तो आईये आप हमारी इस टंकी पर ही चढे,डोनेशन देना चाहे तो हमारे से समपर्क करे, २६ जनवरी २०१० को सुबह ७ बजे हम इस टंकी का महुर्र्त कर रहे है, ओर आईये हम इस पर ब्लांगर झंडा लगा कर इस टंकी को महान बनाये
Tuesday, January 12, 2010 | 35 Comments
जब हम ने सच मै भुत को देखा??
बात बहुत पुरानी है, शायद ४० साल या इस से भी ज्यादा, तब हमारा मकान बन रहा था,नयी आवादी थी, ओर सभी मकान बहुत दुर दुर थे, ओर पिता जी ने सब से पहले एक कमरा बनवाया साथ मै एक स्टोर रुम जहां पर सीमेंट ओर बाकी समान रखा जाता था, मेरी उम्र शायद १३ या १४ बर्ष की होगी,लेकिन उस समय सारी जिम्मेदारी को अच्छी तरह समझता था स्कुळ के बाद मजदुरो के संग काम करना ओर करवाना, ओर सभी मजदुरो को खुश रखना, उन्हे बीडी ओर चाय पिलाना, बदले मै वो भी काम ज्यादा करते थे.
बस युही मजदुरो के संग जब दिन बीताना तो उन से बात भी हो जाती थी, ओर बचपना भी था ही, साथ मै पिता जी ने काफ़ी निडर बना दिया था, अंध विशवास को ना मानना, भूत प्रेत को मानने की तो बात ही नही थी, ओर उसी उम्र मै हम शमशान मै भी आधी रात को डरते मरते धुम आये, ओर जादू टोने जब सडक पर मिलते तो नारियाल फ़ोड कर खाते ओर पेसो से फ़िल्म देखते.
एक राज मिस्त्री जो हमारा मकान बना रहा था, कई दिनो से वो भूत प्रेतो, चुडेल ओर रुह की बाते करता था, अब उन्होने दिन भी काटना होता था सो काम के संग संग गप्पे भी मारनी, एक दिन मेने उन्हे कहा कि दुनिया मै भूत प्रेत नही होते, बस हम लोग ही बाते बना कर ओर अपने खाव्वो मै उन्हे ला कर डरते है, मिस्त्री पिता जी की उम्र का ओर मै बच्चा होते हुये भी उन से बहस रहा था, तो उन्होने कहा बेटा ऎसी बाते नही करते, ओर बात आई गई होगई.
वो गर्मियो के दिन थे पिता जी परिवार समेत स्टोर के समाने सोते थे, कमरे मै, ओर मै खुले मेदान मै ईंटो के पास जहा लोहा बगेरा भी पडा था, ताकि कोई इन चीजो की चोरी ना करे,ओर जब मकान की छत पडनी थी, उस दिन सारा दिन काम चला ओर दोपहर दो बजे लेंटर की तेयारी पुरी हो गई, ओर सब लोगो ने घर जाना चाहा, लेकिन आसमान पर बादल बहुत आ गये लगा कि बरसात ना शुरु हो जाये, ओर मिस्त्री ने बताया की अगर रात को बरसात आ गई तो सारी तेयारी दोवारा करनी पडेगी, तो मेने कहा कि क्यो ना आज ओर अभी हम काम शुरु कर दे, ओर रात तक सारा काम खत्म हो जायेगा.अगर बरसात भी आ गई तो हम छत पर टेंट डाल देगे.
सलाह सब को पसंद आई लेकिन कई मजदुर आना कानी करने लगे, तो मेने उन्हे कहा कि तुम सब कितनी भी देर लगायो, ओर चाहे सारा काम दो तीन घंटे मै खत्म कर दो तुम्हे दो दिन की मजदुरी ओर आज शाम का खाना भी मिलेगा, ओर रात ११ बजे तक सारा काम खत्म हो गया, मजदुरी दे कर सभी लोग घर गये, ओर हम भी बहुत थक गये, ठंडी हवा चल रही थी, तो हम फ़िर से मेदान मै चादर ले कर लेते तो पता नही कब आंख लग गई.
आधी रात के समय हमे लगा कि कोई अजीब सी आवाज निकाल कर हमे बुला रहा है जेसे, फ़िर हमारे ऊपर एक दो ककरी गिरी, तो मेने हाथ बाहर निकाल कर देखा की कही बरसात तो नही आ रही, ओर फ़िर सोने लगा.... तभी मुझे लगा कि कोई मेरी चादर खींच रहा है, ओर साथ मै अजीब सी आवाज आ रही है, ओर जब मै अपनी चार पाई पर बेठा तो सामने देख कर मेरी चीख निकल गई... ओर उस के बाद मेरी बोलती बन्द मै धीरे धीरे चारपाई की दुसरी तरफ़ ही ही करता हुआ खिसकने लगा ओर मेरे बिल्कुल समाने एक सफ़ेद चादर हवा मै झुल रही है, पोर अजीब सी आवाजे आ रही है.मेरा बुरा हाल था.
तभी पिता जी की आवाज आई बेटा डर मत मै आ रहा हुं, ओर पिता जी ने एक लाठ्ठी घुमा कर फ़ेंकी... ओर वो घुमती हुयी सीधी उस भूत के सर पर लगी... ओर आवाज आई अरे बाबू जी मार दिया... ओर फ़िर मुझे अपने ऊपर बहुत गुस्सा आया असल मै वो हमारा राज मिस्त्री था, ओर छत डालने के बाद वो घर गया तो उसे कोई चीज याद आई ओर वो उसे देखने आया तो उसे शरारत सुझी ओर अपना सर तूडवा बेठा.
फ़िर पिता जी ने मुझे समझाया की आईंदा पहले सोचो अगर ऎसी स्थिति मै फ़ंस जाओ तो,डर से कुछ नही होगा, बस बहादुर बनो
Saturday, January 09, 2010 | 25 Comments




