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आज कल हमारे यहां का मोसम

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यह देखिये जब टेमप्रेचर -डिग्री से नीचे जाता है तो, हमारे यहां आज कल रात का टेप्रेचर -२० c के आसपास होता है दिन मै दोपहर को करीब -१०c के करीब पहुच जाता है, नदी नाले सभी जमे हुये है. यह चित्र मेरे घर के नीचे करीब २० मीटर दुर का है, मेरे घर के पास से एक नदी बहती है, जिसे शहर मै एक पक्का रुप दे दिया यानि उसे सीमेंट से पक्का कर दिया, ओर गहरा भी कर दिया, ओर शहर से निकलते ही फ़िर अपने रुप मे आ जाती है, आप जो यह चित्र देख रहे है यह उसी नदी का एक हिस्सा है.




लेकिन इसे उस नदी से अलग कर के दुसरे रास्ते से लाया गया है ओर इस से एक लकडी का आरा, एक आटा पीसने की चक्की चलती है. फ़िर यह मेरे घर के नीचे से हो कर एक कम्पनी मे जाता है, ओर वहा इस के पानी को उपयोग मे लाया जाता है, ओर फ़िर इसे फ़िलटर कर के आगे नदी मै डाल दिया जाता है, ओर उस नदी का पानी भी जमा हुया है.


इन जमे हुये नदी नालो ओर तलाबो पर बच्चे ओर बडे खुब स्केटिंग करते थे, लेकिन अब धीरे धीरे यह रिवाज खत्म होता जा रहा है, क्योकि दुर्घटनाये बहुत होने लगी थी, घरो के अन्दर का ताप मान +२०से +२३c होता है ओर बाहर एक दम से - बस थोडी सी लपरवाही से सर्दी लग जाती है, लेकिन एक बार ताप मान एक जगह पर रुक जाये तो सर्दी का कम ही डर होता है.


सब से ऊपर वाली फ़ोटो उस नदी की हे जिस मे जा कर यह जमी हुई नदी मिलती है, मेरे घर के आसपास छोटी छोटी पहाडियां ओर टीले है, ओर चारो ओर बहुत ज्यादा हरियाली भी है, यह नदी इन्ही टीलो ओर पहाडियो की देन हे, थोडा थोडा पानी रिस कर एक छोटी सी नदी का रुप धारण कर लेता है.





24 टिपण्णी:
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seema gupta said...
13 January 2009 at 8:50 AM  

"चित्र देख कर ऐसा लगा जाडा कंप्यूटर में ही उतर आया .....सुंदर चित्र"

regards

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कविता वाचक्नवी said...
13 January 2009 at 9:35 AM  

मुझे आपकी पोस्ट पढ़कर अपने नॊर्वे के घर की याद खूब आई, जहाँ तापमान -35 डिग्री सेल्सियस तक भी चला जाता था और हम बाहर जाने से पहले कार को स्टार्ट करके उसकी हीटिंग को नॊर्मल तक लाते थे। एकदम ६ महीने सफ़ेदी की चादर में लिपटा रहता था देश।

जर्मनी तो बनिस्बत उससे हरा रहता है।यहाँ तो वोल्व्सबुर्ग में जंगल से घर सटा हुआ ही था। हिरण आ जाया करते थे, सर्दी में उन्हें हरियाली खाने को नहीं मिला करती थी न।

आप आजकल स्नोबोर्ड और आईस स्केटिंग करते बच्चों का मनोहारी दृश्य खूब देख रहे होंगे.. और गुटेमोर्गेन करने वालों की कम होती भीड़ भी। keep enjoying.

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संगीता पुरी said...
13 January 2009 at 10:01 AM  

बहुत सुंदर पिक्‍चर लगाया है आपने....बोकारो में न्‍यूनतम 10-12 डिग्री सेल्सियस में रहने की आदत के कारण इस वर्ष 29 दिसम्‍बर से 8 जनवरी तक दिल्‍ली यात्रा के 4-6 डिग्री सेल्सियस ही मुझे बहुत सर्द महसूस हुआ.....पता न‍हीं शून्‍य से नीचे के तापमान में आपलोग कैसे इतना इंज्‍वाई करते हैं।

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विनय said...
13 January 2009 at 10:16 AM  

मुझे ठण्डी-2 बर्फ़ से कितना प्यार है यह तो सिर्फ़ मैं जानता हूँ, ऊलाला!


--------
आपका सहयोग चाहूँगा कि मेरे नये ब्लाग के बारे में आपके मित्र भी जाने,

ब्लागिंग या अंतरजाल तकनीक से सम्बंधित कोई प्रश्न है अवश्य अवगत करायें
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

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राधिका बुधकर said...
13 January 2009 at 12:02 PM  

फोटो तो बहुत सुंदर आए हैं ,बर्फ में तब्दील नदी कितनी सुंदर दिख रही हैं .

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सुशील कुमार छौक्कर said...
13 January 2009 at 12:08 PM  

हमेशा की तरह फोटो सुन्दर। लगता मुझे भी एक कैमरा खरीदवाके ही मानोगे आप। सोचता हूँ ले लू पर.....। खैर तब तक आपके खीचे फोटो ही देखेगे।

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रंजना [रंजू भाटिया] said...
13 January 2009 at 12:24 PM  

वाह चित्र देख कर ही खुश ही गया दिल ..कभी इस मौसम में आपको रोहतक के खेतों की याद आती है आपको जब ठण्ड में यहाँ सिर्फ़ कोहरा ही कोहरा दिखाई देता है :)

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रंजना said...
13 January 2009 at 1:30 PM  

उप्स, चित्र देखकर ही ठंढ लगने लगी.बहुत सुंदर चित्र हैं..

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Amit said...
13 January 2009 at 1:57 PM  

bahut acche photographs hain....jaade ka anubhav he muje romaanchit kar deta hai....

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Abhishek said...
13 January 2009 at 2:11 PM  

जल प्रबंधन के इस अनूठे विचार के साथ बढ़िया तस्वीरें भी. धन्यवाद.

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P.N. Subramanian said...
13 January 2009 at 2:31 PM  

बहुत खूबसूरत चित्र हैं. भारत में तो ऐसी हालातों की कल्पना ही की जा सकती है. कल ही निआग्रा का पूरा जमा हुआ चित्र देखा था. आज आपका. आभार.

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
13 January 2009 at 2:59 PM  

भाटिया जी, अब समझ आया कि आप भारत की गर्मी से क्यों डर रहे थे? खैर मुझे ये चित्र देख कर सर्दी लगने लगी है। फुल स्वेटर और फर की टोपी पहनने जा रहा हूँ। आ कर मिलता हूँ।

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Arvind Mishra said...
13 January 2009 at 3:27 PM  

कपकपीं छूट गयी !

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Alag sa said...
13 January 2009 at 3:31 PM  

एक बार मनाली में दिसम्बर के महीने मे रहने का "सौभाग्य" मिला था। काफी बर्फ-बारी हुई थी, उस समय "गीतादेवी" बहुत याद आयीं थीं।

गीतादेवी मेरी नानी जी का नाम था।

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महेंद्र मिश्रा said...
13 January 2009 at 3:32 PM  

बड़े जोरदार बर्फीले चित्र हैं देखकर ठण्ड लगने लगी है ... ईई उ ऊ अई
हा हा हा . भाई फोटो बड़े चुनिदा है . प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

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dhiru singh {धीरू सिंह} said...
13 January 2009 at 5:23 PM  

ठण्ड से बचने के लिए हमारे यहाँ प्रवासी पक्षी साईबेरिया से आ जाते है .इतनी ठण्ड हम तो १० ,१२ डिग्री पर ही ठंडे पड़ जाते है .

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गौतम राजरिशी said...
13 January 2009 at 6:26 PM  

बर्फ को लेकर कुछ बड़े ही दर्दनाक अनुभव रहे हैं,,,,,,,तो चुप ही रहूंगा इन तस्वीरों पर

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लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...
14 January 2009 at 4:15 AM  

कल से हमारे शहर का तापमान भी
५* होने जा रहा है !!
अब क्या करेँ ठँड सहनी होगी -
चित्र अच्छे हैँ

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Zakir Ali Rajnish (TSALIIM) said...
14 January 2009 at 10:24 AM  

चित्र देख कर मन प्रसन्‍न हो गया। इस जानकारी के लिए आभार।

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हरि said...
14 January 2009 at 12:03 PM  

छायाचित्र देखकर वोदका याद आ रही है जिसका स्‍वाद चखे हुए करीब इक्‍कीस साल हो गए।

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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...
14 January 2009 at 5:26 PM  

ठंड के मारे पेट में गुड़-गुड़ी होती होगी? यहाँ तो ७-८ डिग्री के पारे पर स्कूल कॉलेज बन्द कर दिए जाते हैं।

वहाँ इतने पर भी क्या जीवन सामान्य सा चलता रहता है?

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bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...
14 January 2009 at 5:54 PM  

hu.....la..la..la..la..huuu...la.la.la.la.aaaa....apan ko bhi bada maza aaya....hoye....hoye....!!

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दिलीप कवठेकर said...
14 January 2009 at 7:52 PM  

बर्फ़ के ये चित्र देख कर सिर्फ़ आनंद ही नही आया, बल्कि पिछले साल की अप्रिल युरोप भेंट की यादें ताज़ा हो गई.

उस समय जर्मनी में डुसेलडोर्फ़, म्युनिक, फ़्रेंकफ़र्ट आदि शहरों में ५ * सेल्सियस तापमान था, मगर थंडी हवाओं के कारण वह भी भारतीय जलवायु से तपे इस शरीर को कंपकंपाने ले लिये काफ़ी था.

वैसे उसके बाद मैं बेल्जियम, फ़िनलॆंड, स्वीडन और नार्वे तक भी गया , जहां शून्य से भी नीचे तापमान था दिन में , और हवांयें सांय सांय चलती थी, तो नानी याद आ जाती थी(नानाजी क्यों नही याद आये, पता नही!!)

अब इन्दौर में पिछले दिनों जब ठंड एकदम से बढी़, तो भी इतनी मेहसूस नहीं हुई.

आप ऐसे ही आपके शहर और आसपास के रोचक वर्णन मय चित्रों के किजीये, ऐसी गुज़ारीश.

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 6:12 AM  


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