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हमे अपनी रीति रिवाजो की कद्र नही, संस्कार क्या हे, इन्हे आज हम वकबास कहते हे....

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मोक्ष के लिए बर्लिन से हरिद्वार
हर की पौडी में गंगा के तट पर चार साल का एक नन्हा बालक अपने पिता की अस्थियां विसर्जित कर रहा है. पिता की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के साथ.पुरी खबर पढने के लिये यहां किल्क करे

17 टिपण्णी:
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प्रवीण पाण्डेय said...
1 November 2010 at 1:20 PM  

बहुत सुन्दर प्रकरण। वैज्ञानिकता के नाम पर परम्पराओं की बलि दी जा रही है।

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निर्मला कपिला said...
2 November 2010 at 4:31 AM  

जोभारतीय इन परंपराओं को भूल रहे हैं उन्हें मूर से सबक लेना चाहिये।बशुत अच्छी पोस्ट। धन्यवाद।

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ZEAL said...
2 November 2010 at 11:38 AM  

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बहुत लोगों को सबक मिलेगा इस पोस्ट से।

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DR. ANWER JAMAL said...
3 November 2010 at 7:47 AM  

कन्या पूजने वाले देश में अंतिम संस्कार बेटे के हाथ से ही क्यों ?

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DR. ANWER JAMAL said...
3 November 2010 at 7:48 AM  

कन्या पूजने वाले देश में अंतिम संस्कार बेटे के हाथ से ही क्यों ?

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संजय कुमार चौरसिया said...
3 November 2010 at 1:53 PM  

आपको समस्त परिवार सहित
दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक शुभ-कामनाएं
धन्यवाद
संजय कुमार चौरसिया

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Pyaasa Sajal said...
3 November 2010 at 5:30 PM  

is khabar ko main ek alag nazar se dekhta hoon....ek german ka vichaar ye ho sakta hai ki wahaan german sanskaaron ka apmaan hua hai...saamjhne ki baat ye hai ki jo vishwas insaan dil se maane aur apnaaye wohi saccha sanskaar hai

yun bhi is duniya ki sabse badi kamee yehi hai ki darm aur jaat insaan nahi chunta uspe thope jaate hai...mere hisaab se har vichaar, har dharm, har sankar ko jab barabari se apnaane ki chhoot hogi tab sabhi baraabar hinge...sabhi sacche honge

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BrijmohanShrivastava said...
5 November 2010 at 7:48 AM  

आप को सपरिवार दीपावली मंगलमय एवं शुभ हो!
मैं आपके -शारीरिक स्वास्थ्य तथा खुशहाली की कामना करता हूँ

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Meenu Khare said...
5 November 2010 at 10:39 AM  

सुन्दर .दीप पर्व की हार्दिक बधाई।

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गिरीश बिल्लोरे said...
6 November 2010 at 6:28 AM  

उत्तम पोस्ट शुभकामनाएं
_____________________________________
बराक़ साहब का स्वागत
_____________________________________

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Coral said...
7 November 2010 at 2:00 PM  

सच बात है ....
हमारे रीती रिवाज़ और संस्कार हमें कई पाश्चात्य बुराइयों से बचाते हैं ...
बहुत अच्छी खबर ...

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JHAROKHA said...
7 November 2010 at 4:22 PM  

aapke is aalekh ko padh kar main bahut jyada hi prabhavit ho gai hun.aapne ise likh kar aur logo tak yah pahunche yah ek bhaut hi achha kaam kiya hai.
meri taraf se aapko bahut bahut badhai.
poonam

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ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...
13 November 2010 at 1:06 PM  

हो सकता है यह पोस्ट पढने के बाद कुछ लोगों के मन में अपने संस्कारों के प्रति जागरूकता पैदा हो !
श्रध्दा और विश्वास ही तो जीवन को सुन्दर बनाते हैं !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...
15 November 2010 at 9:46 AM  

अपनी पम्पराओं की बलि चढ़ाने वालों को सोचने पर मजबूर करती है ये पोस्ट !
धन्यवाद !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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Suman said...
8 December 2010 at 4:49 PM  

nice

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Akshita (Pakhi) said...
9 December 2010 at 12:38 PM  

):_

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:13 AM  


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