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गाऊ माता????

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भारत मै अगर कोई गाय को मार दे तो धर्म के ठेके दार आसमान सर मै ऊठा लेते है, लेकिन पुरी दुनिया मै सब से ज्यादा दुर्दशा गाय की भारत मै ही होती है, वेसे भी अब लोग जब अपने मां बाप को ही घर से निकाल देते है धक्के मार कर तो यह गाऊ माता कोन है???

अब बात करते है इस चित्र की, बचपन मै हम देखते थे कि गर्मियो मै जगह जगह प्याऊ होते थे, ओर उस के साथ ही जानवरो के पीने के लिये पानी की व्यवस्था होती थी, यानि जो पानी नीचे गिरता था वो सीधा टब मे जाता ओर  वहां प्यासे जानवर भी आ कर पानी पी लेते  थे, लेकिन जेसे जेसे हम आधुनिकता की ओर बढते गये, हम मै इंसानियत मरती गई, अब हम अपनी पानी की बोतल तो साथ रखते है, लेकिन इन मासूम ओर निर्दोष जानवरो का ख्याल बिलकुल नही करते, मुझे आज भी याद है कि कई बार भरी दोपहरी मै हमारे गेट पर गाय या कोई अन्य जानबर आ कर सींग मार कर बुलाते थे, ओर मै मां के कहने पर उन्हे बाल्टी भर कर पानी पिलाता था, ओर मां कहती थी बेटा यह पुन्य का काम है.... तो अब गर्मियां शुरु हो गई है अगर आप भी रोजाना एक जानवर को भर पेट पानी पिला दे तो आप को भी पुन्य जरुर मिलेगा, जरुरी नही वो गाय ही हो बंदर कुता, गधा, भेंस या कोई भी जानवर देखे जो प्यासा हो उसे एक बार पानी पिला कर देखे आप को कितनी शांति मिलती है, इन जानवरो को भी तो हमारी तरह से ही प्यास लगती है ना..... बस यह बोल नही सकते.

27 टिपण्णी:
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M VERMA said...
8 May 2010 at 10:49 AM  

इन निरीहों की सुध लेता कौन है

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vikas mehta said...
8 May 2010 at 11:15 AM  

bhut sunder vichar ese kam honge to dhrm sdaa rahega

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मनोज कुमार said...
8 May 2010 at 11:37 AM  

पशुओं को भी हमारी तरह से ही प्यास लगती है। संवेदनशील रचना।

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honesty project democracy said...
8 May 2010 at 11:40 AM  

सरकार में बैठे झूठे पशु प्रेमियों को आपके इस पोस्ट को पढना चाहिए ,हलांकि गोउ रक्षा के दिशा में कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं काम कर रही है ,लेकिन सही मायने में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है,और सरकारी व्यवस्था का तो ये हाल है की दिल्ली जैसे देश की राजधानी में भी इन्सान को आसानी से पिने का पानी नसीब नहीं होता तो पालतू जानवरों की कौन सुध लेगा / उम्दा पोस्ट /

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दीपक 'मशाल' said...
8 May 2010 at 11:45 AM  

ek dukhad pahloo ko saamne laya aapne.. isse bhi buri halat bailon ki hai jinhe log bhoolte hi ja rahe hain.. sach kahiye aapne kab se koi bail nahin dekha? nagarnigam walon ya neta ko koi jaanwar vote thode hi deta hai jo wo unke liye pyaau lagwa den .. are bhai jo vote dete hain unke bare me to soch nahin pate bechare.. :)

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aarya said...
8 May 2010 at 12:56 PM  

सादर वन्दे !
मानवता का यह पाठ पढ़ाने के लिए धन्यवाद!
रत्नेश त्रिपाठी

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नीरज जाट जी said...
8 May 2010 at 1:15 PM  

बहुत बडी विकट समस्या है।
इन्सानियत खत्म।

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
8 May 2010 at 2:39 PM  

पानी की कमी का बहुत हल्ला है। लेकिन इंसान कोशिश करे तो क्या नहीं कर सकता वह अपनी और बेजुबान जानवरों, दोनों की जरूरत पूरी कर सकता है।

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जी.के. अवधिया said...
8 May 2010 at 3:02 PM  

पहले तो चिड़ियों को भी पिलाने के लिये दीवारों के ऊपर पानी भरे मिट्टी के बर्तन रखे जाते थे जो आजकल दिखाई ही नहीं पड़ते।

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पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...
8 May 2010 at 4:28 PM  

आज इन्सान के पास खुद के बारे में सोचने से ही फुर्सत नहीं है तो भळा वो जानवरों के बारे में क्या सोचेगा....लगता है कि वाकई में इन्सानियत कहीं खो सी गई है..

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Suman said...
8 May 2010 at 5:25 PM  

nice

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HTF said...
9 May 2010 at 2:38 AM  

अच्छा सुझाब है सबको मानना चाहिए

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zeal said...
9 May 2010 at 2:54 AM  

लेकिन इंसान कोशिश करे तो क्या नहीं कर सकता वह अपनी और बेजुबान जानवरों, दोनों की जरूरत पूरी कर सकता है।

Dwivedi ji se sehmat hun

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aprana said...
9 May 2010 at 8:17 AM  

isi ko khte hain paakhand.naari ho, bachhe hon. mook jeev jantu hon. dharmo mein un pe dya ka paath pdaya gya hai. hakikat mein un pe amal kam hi hota hai. kuchch log jroor gayon aur panchchiyon ki pyas bujhane ke intzaam krte hain.hume bhi is disha me jo ban pde krna chahiye

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girish pankaj said...
9 May 2010 at 8:18 AM  

priy bhai,,gaay par kuchh aur jankaari mile to mujhe mail karane kakasht kare. mai ek upanyaas likh raha hu. girishpankaj1@gmail.com

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हरकीरत ' हीर' said...
9 May 2010 at 9:46 AM  

राज़ जी बहुत दिनों से आपका ब्लॉग नहीं खुल रहा था ......वजह तो पता नहीं रश्मि प्रभा जी ने भी अपनी एक पोस्ट में इस बात को उठाया था .....अन्यथा न लें ....और आपने ये पशुओं को पानी पिलाने कि बात खूब कही पर महानगरों में पशु खुले कहाँ मिलते हैं ....!!

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hem pandey said...
9 May 2010 at 10:42 AM  

आज भी अनेक स्थानों पर जानवरों के लिए लोगों ने अपने घर के बाहर पानी की टंकियां बना रखी हैं.लेकिन वे सूखी रहती हैं क्योंकि मनुष्य को स्वयं के लिए भी पानी नसीब नहीं हो रहा है. मध्य प्रदेश के अनेक शहरों में एक दिन और दो दिन के अंतराल से स्थानीय निकाय पानी उपलब्ध करा रहे हैं.पानी के लिए झगडे और हत्याएं तक हो चुकी हैं.
कुछ समय से आपका ब्लॉग खुल नहीं पा रहा था.आज खुला है.

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ताऊ रामपुरिया said...
9 May 2010 at 2:10 PM  

बहुत विकट समस्या है.

रामराम.

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ज्योति सिंह said...
9 May 2010 at 5:01 PM  

इस अवसर पर आपने इस मा को याद कर आज का दिन सार्थक कर दिया ,ये तो हमे बहुत कुछ देती है .सुन्दर रचना .

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शरद कोकास said...
13 May 2010 at 10:49 PM  

भाटिया जी यह आपने अच्छी बात लिखी है । मै तो दिन भर प्यासे जानवरों को और पौधों को पानी पिलाता रहता हूँ |

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'उदय' said...
15 May 2010 at 7:21 AM  

...प्रभावशाली अभिव्यक्ति!!!

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सर्वत एम० said...
16 May 2010 at 7:03 AM  

राज भाई, आपसे मिलने से पहले ही लगा था कि आपके सीने में एक दर्दमंद दिल है. मिलने के बाद इस धारणा को पुख्ता सबूत मिल गया. आज इस पोस्ट ने आपके हक में सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही पेश कर दिया.
हम सुविधा और आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपने सभी संस्कार भूलते जा रहे हैं. मैं भुक्त भोगी हूँ. एक दरवाजे पर पानी माँगा था, इंकार मिला. जब आदमी को पानी नहीं मिलता फिर मवेशियों को कौन दे? आदमी तो एक-दो ग्लास ही पीता है, मवेशी बाल्टी सोख जाएगा.
गो-रक्षा समितियां बनी हुई हैं. सडकों पर गाएं लाठी-डंडों सी पीटी जाती हैं, भूख मिटाने के लिए पोलीथिन खा कर मौत को गले लगा रही हैं, कोई देख कर कुछ करता है क्या? गोशाला के नाम पर चंदा मिलना चाहिए, अख़बारों में नाम-फोटो छपने चाहिएं, बस!

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सुमन'मीत' said...
16 May 2010 at 8:40 PM  

सच लिखा है आपने ये बेजुबान पशु क्या कर सकते हैं ।इस समस्या की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए

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Vidhu said...
18 May 2010 at 1:46 PM  

आद भाटिया जी ,बेहद दिनों बाद आना हुआ ....लेकिन सार्थक लगा, मूक जानवरों के प्रति हमारी संवेदनाएं जीवित रहें इससे बड़ी बात क्या होगी लेकिन लोग अनदेखा करते हेँ ....हम वाकई सामाजिक सरोकारों के साथ दया धर्म से भी पीछे होते जा रहें हेँ ...हमने अपने बगीचे में मिटटी के बर्तन में पानी रखने की व्यवस्था की है और एक छोटा सा बांस का घर भी बनवाया है ताकि प्यासे पक्षी सूकून से बैठ कर पानी पी सके ...उसमे अक्सर नन्ही गिलहरियाँ और रंगीन पक्षी आ बैठते हेँ देख कर ही मन प्रसन्न हो जाता है अभी कल ही भास्कर के एडिटोरियल पेज पर रस्किन बोंड का एक दिलचस्प लेख छपा है ...मूक पशु पक्षियों के विषय में .... गर माह की सर्वश्रेष्ठ रचना का जिम्मा मुझे दिया जाए तो में इसे प्रथम नं दूंगी ..आभार

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स्वाति said...
24 May 2010 at 12:47 PM  

सार्थक-संवेदनशील रचना। सुझाब सबको मानना चाहिए.

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indu puri said...
26 May 2010 at 8:29 AM  

प्रणाम सर!
कहते हैं विदेश में जाने के बाद अपना मुल्क बहुत याद आता है किन्तु व्यक्ति मटेरियलिस्टिक हो जाता है कि उसकी कई सम्वेदनाए अपना भीगापन खो देती है.किन्तु आपका यह 'आर्टिकल' पढ़ कर बहुत अच्छा महसूस हुआ.गायों और अन्य पशु पक्षियों के प्रति इस भीषण गर्मी में इतना चिंतित होना आपके मन की सम्वेदनशीलता को बताता है.
अच्छा लगा. पढ़ कर, लोगों को यूँही जगाते रहियेगा.

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:21 AM  



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