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जब हम ने सच मै भुत को देखा??

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बात बहुत पुरानी है, शायद ४० साल या इस से भी ज्यादा, तब हमारा मकान बन रहा था,नयी आवादी थी, ओर सभी मकान बहुत दुर दुर थे, ओर पिता जी ने सब से पहले एक कमरा बनवाया साथ मै एक स्टोर रुम जहां पर सीमेंट ओर बाकी समान रखा जाता था, मेरी उम्र शायद १३ या १४ बर्ष की होगी,लेकिन उस समय सारी जिम्मेदारी को अच्छी तरह समझता था स्कुळ के बाद मजदुरो के संग काम करना ओर करवाना, ओर सभी मजदुरो को खुश रखना, उन्हे बीडी ओर चाय पिलाना, बदले मै वो भी काम ज्यादा करते थे.

बस युही मजदुरो के संग जब दिन बीताना तो उन से बात भी हो जाती थी, ओर बचपना भी था ही, साथ मै पिता जी ने काफ़ी निडर बना दिया था, अंध विशवास को ना मानना, भूत प्रेत को मानने की तो बात ही नही थी, ओर उसी उम्र मै हम शमशान मै भी आधी रात को डरते मरते धुम आये, ओर जादू टोने जब सडक पर मिलते तो नारियाल फ़ोड कर खाते ओर पेसो से फ़िल्म देखते.

एक राज मिस्त्री जो हमारा मकान बना रहा था, कई दिनो से वो भूत प्रेतो, चुडेल ओर रुह की बाते करता था, अब उन्होने दिन भी काटना होता था सो काम के संग संग गप्पे भी मारनी, एक दिन मेने उन्हे कहा कि दुनिया मै भूत प्रेत नही होते, बस हम लोग ही बाते बना कर ओर अपने खाव्वो मै उन्हे ला कर डरते है, मिस्त्री पिता जी की उम्र का ओर मै बच्चा होते हुये भी उन से बहस रहा था, तो उन्होने कहा बेटा ऎसी बाते नही करते, ओर बात आई गई होगई.

वो गर्मियो के दिन थे पिता जी परिवार समेत स्टोर के समाने सोते थे, कमरे मै, ओर मै खुले मेदान मै ईंटो के पास जहा लोहा बगेरा भी पडा था, ताकि कोई इन चीजो की चोरी ना करे,ओर जब मकान की छत पडनी थी, उस दिन सारा दिन काम चला ओर दोपहर दो बजे लेंटर की तेयारी पुरी हो गई, ओर सब लोगो ने घर जाना चाहा, लेकिन आसमान पर बादल बहुत आ गये लगा कि बरसात ना शुरु हो जाये, ओर मिस्त्री ने बताया की अगर रात को बरसात आ गई तो सारी तेयारी दोवारा करनी पडेगी, तो मेने कहा कि क्यो ना आज ओर अभी हम काम शुरु कर दे, ओर रात तक सारा काम खत्म हो जायेगा.अगर बरसात भी आ गई तो हम छत पर टेंट डाल देगे.

सलाह सब को पसंद आई लेकिन कई मजदुर आना कानी करने लगे, तो मेने उन्हे कहा कि तुम सब कितनी भी देर लगायो, ओर चाहे सारा काम दो तीन घंटे मै खत्म कर दो तुम्हे दो दिन की मजदुरी ओर आज शाम का खाना भी मिलेगा, ओर रात ११ बजे तक सारा काम खत्म हो गया, मजदुरी दे कर सभी लोग घर गये, ओर हम भी बहुत थक गये, ठंडी हवा चल रही थी, तो हम फ़िर से मेदान मै चादर ले कर लेते तो पता नही कब आंख लग गई.

आधी रात के समय हमे लगा कि कोई अजीब सी आवाज निकाल कर हमे बुला रहा है जेसे, फ़िर हमारे ऊपर एक दो ककरी गिरी, तो मेने हाथ बाहर निकाल कर देखा की कही बरसात तो नही आ रही, ओर फ़िर सोने लगा.... तभी मुझे लगा कि कोई मेरी चादर खींच रहा है, ओर साथ मै अजीब सी आवाज आ रही है, ओर जब मै अपनी चार पाई पर बेठा तो सामने देख कर मेरी चीख निकल गई... ओर उस के बाद मेरी बोलती बन्द मै धीरे धीरे चारपाई की दुसरी तरफ़ ही ही करता हुआ खिसकने लगा ओर मेरे बिल्कुल समाने एक सफ़ेद चादर हवा मै झुल रही है, पोर अजीब सी आवाजे आ रही है.मेरा बुरा हाल था.

तभी पिता जी की आवाज आई बेटा डर मत मै आ रहा हुं, ओर पिता जी ने एक लाठ्ठी घुमा कर फ़ेंकी... ओर वो घुमती हुयी सीधी उस भूत के सर पर लगी... ओर आवाज आई अरे बाबू जी मार दिया... ओर फ़िर मुझे अपने ऊपर बहुत गुस्सा आया असल मै वो हमारा राज मिस्त्री था, ओर छत डालने के बाद वो घर गया तो उसे कोई चीज याद आई ओर वो उसे देखने आया तो उसे शरारत सुझी ओर अपना सर तूडवा बेठा.

फ़िर पिता जी ने मुझे समझाया की आईंदा पहले सोचो अगर ऎसी स्थिति मै फ़ंस जाओ तो,डर से कुछ नही होगा, बस बहादुर बनो

30 टिपण्णी:
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RC Mishra said...
10 January 2010 at 2:01 AM  

ह्म्म अच्छा रहा, भूत को देख लेते तो बेचारा मिस्त्री बच जाता न..

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M VERMA said...
10 January 2010 at 2:55 AM  

भूत पर तो भभूत डालते हैं लट्ठ क्यों मारी!!
मजेदार

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dhiru singh {धीरू सिंह} said...
10 January 2010 at 2:58 AM  

मैने भी कई भूत देखे है इसी तरह के .

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संगीता पुरी said...
10 January 2010 at 3:45 AM  

बेचारे राज मिस्‍त्री को डंडा खाना पडा .. वैसे उतनी रात गए उसे शैतानी करने की क्‍या आवश्‍यकता थी !!

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श्री श्री साढ़े सात हजार बाबा सांडनाथ !! said...
10 January 2010 at 3:54 AM  

ha..ha.. mistri ka bhi bichare ka sar fut gayaa!!!

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खुशदीप सहगल said...
10 January 2010 at 3:58 AM  

राज जी,
किसी ने सच कहा डर से मत डरो...आगे बढ़ो...क्योंकि डर के आगे ही जीत है...

डिस्क्लेमर...डरना है तो बस अपनी पत्नी से डरो...

जय हिंद...

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डॉ. मनोज मिश्र said...
10 January 2010 at 4:30 AM  

यह भी गजब रहा राज साहब.

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ललित शर्मा said...
10 January 2010 at 5:14 AM  

हा हा हा भाटिया जी-अब आप आयेंगे तो उस भुत को दोनो मिल के ढुंढेगे, पता नही अब वो सचमुच का भुत हो गया हो।:)

बस आपका ईंतजार है।

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
10 January 2010 at 5:25 AM  

बेचारा भूत! उस ने सोचा भी न होगा कि सर पर लट्ठ पड़ जाएगा! सुंदर आख्यान!

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Udan Tashtari said...
10 January 2010 at 5:54 AM  

आपके पास भी अजब गजब किस्से रहते हैं...

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निर्मला कपिला said...
10 January 2010 at 6:05 AM  

ेआपका शीर्शक पढ कर तो सच मे डर गयी थी हा हा हा रोचक संस्मरण ।

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महफूज़ अली said...
10 January 2010 at 7:08 AM  

मुझे लगता है मैं बहादुर हूँ...

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डॉ महेश सिन्हा said...
10 January 2010 at 7:10 AM  

खुशदीप से कुछ सहमत

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दिगम्बर नासवा said...
10 January 2010 at 8:14 AM  

भाटिया जी ....... पढ़ते हुवे तो सिरहन दौड़ रही थी .......... पर जब पिता जी ने लट्ठ घुमाया तो जान में जान आई ....... अच्छा संस्मरण है ........ साथ में सीख भी देता है ..........

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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...
10 January 2010 at 8:34 AM  

रोचक लगा यह वाकया।

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rashmi ravija said...
10 January 2010 at 9:29 AM  

शुरू में तो सच में हमें लगा...आप कोई भूत वाली कहानी बता रहें हैं...पर ये तो शरारत वाला भूत था...पर आप इतनी कम उम्र में इतनी जिम्मेवारी वाले काम करते थे और खुले में अकेले सोने से नहीं डरते थे.....फिर तो भूत ही आपसे डरेगा...उसकी क्या हिम्मत जो आपको डराए.

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जी.के. अवधिया said...
10 January 2010 at 10:13 AM  

बहुत ही सुन्दर संस्मरण सुनाया राज जी आपने!

भूत से ज्यादा डरावना भूत का डर होता है।

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Murari Pareek said...
10 January 2010 at 10:59 AM  

ये आपने मजाक करदी !!! लेकिन भुत सच मच होते हैं ज़िंदा इंसानों में!!

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समयचक्र said...
10 January 2010 at 11:03 AM  

राज जी बहुत रोचक ... हाँ एक बार का वाक्या याद आया . एक कमरे में पांच भाई मिलकर सोते थे . ठण्ड के दिन थे रात को अँधेरे कमरे में छोटे भाई को कोई परछाई दिखी सो उसने चिल्लाना शुरू कर दिया .. भूत भूत . फिर क्या था अँधेरे में सभी भाइयो में भूत भूत कह कर आपस में मारपीट होने लगी. घर में चिल्ला पौ सुनकर उनके पापा ने कमरे में आकर लाईट जलाई . तब तक चार भाइयो ने एक भाई की भूत समझ कर अच्छी खासी पिटाई कर दी थी . मेरी समझ से ये सब भ्रम है और कुछ नहीं ... जब जब वो वाक्या याद आता है तो खूब हंसी आती है ..

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kase kahun?by kavita. said...
10 January 2010 at 11:49 AM  

ha ha aap ne to bhut ke bhi bhut bhaga diye. rochak kissa.

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अन्तर सोहिल said...
11 January 2010 at 7:27 AM  

हा-हा-हा
बढिया संस्मरण

प्रणाम

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singhsdm said...
11 January 2010 at 7:49 AM  

भाटिया साहब
अरसे बाद भूतों की कोई कहानी सुनी....मज़ा आ गया.....!

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पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...
11 January 2010 at 3:28 PM  

ये भी खूब रही :)
हम तो समझे थे कि भाटिया जी ने सचमुच का कोई भूत देखा होगा...लेकिन आपने तो बेचारे मिस्त्री का सिर फुडवा डाला ।

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Apanatva said...
26 January 2010 at 6:07 AM  

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.......

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संजय भास्कर said...
28 January 2010 at 5:49 PM  

भाटिया जी ....... पढ़ते हुवे तो सिरहन दौड़ रही थी .......... पर जब पिता जी ने लट्ठ घुमाया तो जान में जान आई ....... अच्छा संस्मरण है ........ साथ में सीख भी देता है .....

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priyadarshan said...
10 May 2012 at 10:09 AM  

जिस चीज़ का नाम है वो है भूत भी होते है मैंने कई बार face किया है इन्हें

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nilesh dubey said...
16 October 2013 at 7:07 PM  

NICE YAAR ,PHLE AADHI STORY READ KR KE MAY AAP KO GAALI DENA SURU KR DIYA THA KI GALAT STORY HAI BUT JB PURA READING KIYA TO BDA MJA AAYA

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nilesh dubey said...
16 October 2013 at 7:07 PM  

NICE YAAR ,PHLE AADHI STORY READ KR KE MAY AAP KO GAALI DENA SURU KR DIYA THA KI GALAT STORY HAI BUT JB PURA READING KIYA TO BDA MJA AAYA

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nilesh dubey said...
16 October 2013 at 7:10 PM  

are yaar jb story aadhi thi to lga gappe baaj hai aur jb puri story reading ki to pta chla bhoot saala apna raaj hai

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:27 AM  


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