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शीशीईईईईईईईईईईईईई कोई सुन रहा है.

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सुना था दिवारो के भी कान होते है, लेकिन यह क्या? अब मुर्तियां भी .....

10 टिपण्णी:
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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
19 January 2009 at 3:46 AM  

जब दीवारें सुन सकती हैं तो दीवारें क्यों नहीं?

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Anil Pusadkar said...
19 January 2009 at 4:07 AM  

मूर्ती भी शायद किसी अछी खबर का इंतज़ार कर रही है।

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दिलीप कवठेकर said...
19 January 2009 at 4:47 AM  

वाह !! क्या स्नॆप चित्र है, संग्रहणीय!!!

इस तरह के चित्रों को देख कर ये तय है, कि आपके संवेदनशील मन का प्रतिबिंब आपकी दृष्टी में परिलक्षित होता है, और उसमें जो भाव है, वह आप अपने कॆमेरे में कैद कर हम पाठकों को दिखाते है और खुश कर देते हैं.

मैं कोशिश करूंगा की यह चित्र यहां आपके जानिब से कहीं प्रकाशित हो.आपको कोइ आपत्ति ना होगी.

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seema gupta said...
19 January 2009 at 5:27 AM  

"wowwwwwwww amezingggg........"

Regards

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Amit said...
19 January 2009 at 7:21 AM  

bahut sahi....

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ताऊ रामपुरिया said...
19 January 2009 at 9:15 AM  

शानदार चित्र.

रामराम.

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Mrs. Asha Joglekar said...
19 January 2009 at 10:57 AM  

बहुत खूबसूरत चित्र । और अपने जैसे केवल एक । आपकी भूली हुई चांदनी भी कमाल की है ।
हाँ आप कुछ जानकारी चाहते थे तो हमने तो अपनी यात्रा ट्रेन से की और बुकिंग भी यूएस में रहते ही करवा ली थी । आइ आरसी टी सी की साइट से । और हर शहर पहुंचने के बाद टैक्सी से ।
आपको नव वर्ष की बधाई ।

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Meenakshi Kandwal said...
19 January 2009 at 7:32 PM  

Mindblowing...
I must say Rich collection of wonderful pictures :)

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समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...
20 January 2009 at 5:18 PM  

धीरे धीरे बोल कोई सुन न ले

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 6:09 AM  


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