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भगवान विष्णु जी ओर माता लक्ष्मी जी की एक कहानी.

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कहानियां कथा हमे शिक्षा देने के लिये ही होती है, इस लिये हमे इस बहस मै नही पडना चाहिये कि ऎसा नही हो सकता या यह बस एक कल्पना है, या यह एक अंध विश्च्वास है, जेसे बाजर मै जा कर हम अपनी पसंद का ही समान लेते है वेसे ही हमे भी इन कहानियो ओर कथाओ से अपनी पंसद का ग्याण ले लेना चाहिये।

आज की यह कथा दिपावली पर है ओर आशा करता हुं , आप इस से कुछ ना कुछ जरुर प्राप्त करेगे, ओर इस कथा के साथ साथ मै आप सब को दिपावली की बधाई देता हुं, भगवान से आप सब के लिये शुभकामनाये चाहता हूं आप सब को दिपावली हंसी खुशी आये, ओर दीपो के समान आप सब के जीवन मै से अंधेरा मिटा कर रोशनी करे, आप सब खुश रहै। शुभ दिपावली.

भगवान विष्णु जी ओर माता लक्ष्मी जी की एक कहानी।

एक बार भगवान विष्णु जी शेषनाग पर बेठे बेठे बोर होगये, ओर उन्होने धरती पर घुमने का विचार मन मै किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, ओर वह अपनी यात्रा की तेयारी मे लग गये, स्वामी को तेयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा !!आज सुबह सुबह कहा जाने कि तेयारी हो रही है?? विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हुं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हुं???? भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी मनवाली।


ओर सुबह सुबह मां लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुच गये, अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी, ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, ओर मां लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, ओर भुल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है?ओर चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला।

उत्तर दिशा मै मां लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया, ओर उस तरफ़ से भीनी भीनी खुशबु आ रही थी,ओर बहुत ही सुन्दर सुन्दर फ़ुल खिले थे,यह एक फ़ुलो का खेत था, ओर मां लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस खेत मे गई ओर एक सुंदर सा फ़ुल तोड लाई, लेकिन यह क्या जब मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखो मै आंसु थे, ओर भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पुछे उस का कुछ भी नही लेना चाहिये, ओर साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया।

मां लक्ष्मी को अपनी भुल का पता चला तो उन्होने भगवान विष्णु से इस भुल की माफ़ी मागी, तो भगवान विष्णु ने कहा कि जो तुम ने जो भुल की है उस की सजा तो तुम्हे जरुर मिलेगी?? जिस माली के खेत से तुम नए बिना पुछे फ़ुल तोडा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इस लिये अब तुम तीन साल तक माली के घर नोकर बन कर रहॊ, उस के बाद मै तुम्हे बैकुण्ठ मे वपिस बुलाऊंगा, मां लक्ष्मी ने चुपचाप सर झुका कर हां कर दी( आज कल की लक्ष्मी थोडे थी?

ओर मां लक्ष्मी एक गरीब ओरत का रुप धारण करके , उस खेत के मालिक के घर गई, घर क्या एक झोपडा था, ओर मालिक का नाम माधव था, माधब की बीबी, दो बेटे ओर तीन बेटिया थी , सभी उस छोटे से खेत मै काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे,

मां लक्ष्मी जब एक साधारण ओर गरीब ओरत बन कर जब माधव के झोपडे पर गई तो माधव ने पुछा बहिन तुम कोन हो?ओर इस समय तुम्हे क्या चाहिये? तब मां लक्ष्मी ने कहा ,मै एक गरीब ओरत हू मेरी देख भाल करने वाला कोई नही, मेने कई दिनो से खाना भी नही खाया मुझे कोई भी काम देदॊ, साथ मै मै तुम्हरे घर का काम भी कर दिया करुगी, बस मुझे अपने घर मै एक कोने मै आसरा देदो? माधाव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गई, लेकिन उस ने कहा, बहिन मै तो बहुत ही गरीब हुं, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुस्किल से चलता है, लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटिया होती तो भी मेने गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर जेसा रुखा सुखा हम खाते है उस मै खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।

माधाव ने मां लक्ष्मी को अपने झोपडे मए शरण देदी, ओर मां लक्ष्मी तीन साल उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही;

जिस दिन मां लक्ष्मी माधव के घर आई थी उस से दुसरे दिन ही माधाव को इतनी आमदनी हुयी फ़ुलो से की शाम को एक गाय खरीद ली,फ़िर धीरे धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खारीद ली, ओर सब ने अच्छे अच्छे कपडे भी बनबा लिये, ओर फ़िर एक बडा पक्का घर भी बनबा लिया, बेटियो ओर बीबी ने गहने भी बनबा लिये, ओर अब मकान भी बहुत बडा बनाबा लिया था।

माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रुप मे मेरी किस्मत आ गई है मेरी, ओर अब २-५ साल बीत गये थे, लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर मै ओर खेत मै काम करती थी, एक दिन माधव जब अपने खेतो से काम खत्म करके घर आया तो उस ने अपने घर के सामने दुवार पर एक देवी स्वरुप गहनो से लदी एक ओरात को देखा, ध्यान से देख कर पहचान गया अरे यह तो मेरी मुहं बोली चोथी बेटी यानि वही ओरत है, ओर पहचान गया कि यह तो मां लक्ष्मी है.
अब तक माधव का पुरा परिवार बाहर आ गया था, ओर सब हेरान हो कर मां लक्ष्मी को देख रहै थे,माधव बोला है मां हमे माफ़ कर हम ने तेरे से अंजाने मै ही घर ओर खेत मे काम करवाया, है मां यह केसा अपराध होगया, है मां हम सब को माफ़ कर दे

अब मां लक्ष्मी मुस्कुराई ओर बोली है माधव तुम बहुत ही अच्छे ओर दयालु व्यक्त्ति हो, तुम ने मुझे अपनी बेती की तरह से रखा, अपने परिवार के सदस्या की तरह से, इस के बदले मै तुम्हे वरदान देती हुं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियो की ओर धन की कमी नही रहै गी, तुम्हे सारे सुख मिलेगे जिस के तुम हक दार हो, ओर फ़िर मां अपने स्वामी के दुवारा भेजे रथ मे बेठ कर बेकुण्ठ चली गई

इस कहानी मै मां लक्ष्मी का संदेशा है कि जो लोग दयालु ओर साफ़ दिल के होते है मै वही निवास करती हुं, हमे सभी मानवओ की मदद करनी चाहिये, ओर गरीब से गरीब को भी तुच्छ नही समझना चाहिये।

शिक्षा..... इस कहानि मै लेखक यहि कहना चाहता है कि एक छोटी सी भुल पर भगवान ने मां लक्ष्मी को सजा देदी हम तो बहुत ही तुच्छ है, फ़िर भी भगवान हमे अपनी कृपा मे रखता है, हमे भी हर इन्सान के प्र्ति दयालुता दिखानि ओर बरतनि चाहिये, ओर यह दुख सुख हमारे ही कर्मो का फ़ल है
एक बार फ़िर से आप सब को दिपावली की शुभकामनऎ, आप सब को मां लक्ष्मी का आशिर्वाद मिले आप सब को भगवान विष्णु खुश रखे, बिना जुआ खेले बिना कोई गलत काम किये इस दिपावली को परिवार के साथ मानाये ओर किसी की आंख से एक आंसु पोछे फ़िर देखे कितना मजा आता है इस दिपावली का
धन्यवाद

20 टिपण्णी:
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Udan Tashtari said...
25 October 2008 at 12:28 AM  

आभार इस कथा के लिए.

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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ताऊ रामपुरिया said...
25 October 2008 at 6:32 AM  

बहुत सुंदर और शिक्षाप्रद कहानी ! हमने भी बगीचे में बहुत सारे फूल उगा रखे हैं ! आप तो एक बार एक फूल तुड़वा दो लक्ष्मी जी से , फ़िर हम ३ वर्ष तो क्या तीन जनम भी कहीं नही जाने देंगे उनको ! हमारे ही क्या ? सारे ब्लॉगर भाई बहनों के साथ उनको रखेंगे ! लट्ठ तो आपने भिजवा ही रक्खा है ! :)

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Dr. Nazar Mahmood said...
25 October 2008 at 8:30 AM  

खूबसूरत रचना
दीपावली की हार्दिक शुबकामनाएं

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अभिषेक ओझा said...
25 October 2008 at 8:42 AM  

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें... दीपावली पर एक अच्छी और प्रेरक प्रस्तुति.

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जगदीश त्रिपाठी said...
25 October 2008 at 2:09 PM  

आपको इस प्रेरक कथा के लिए धन्यवाद। मां लक्ष्मी आपके घर-परिवार को सदा आलोकित करती रहें। दीपावली पर हार्दिक बधाई। वैसे अपने बच्चों के ताऊ के विचार से मैं भी सहमत हूं। लेकिन भाई बेटी कब तक रखी जाएगी। उसे ससुराल तो भेजना ही पड़ेगा। हम उस लट्ठ का इस्तेमाल विष्णु जी को दिखाने के लिए कर सकते हैं। जिससे भविष्य में वह लक्ष्मी जी को फिर ऐसी सजा न दें।

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dhiru singh {धीरू सिंह} said...
25 October 2008 at 4:03 PM  

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

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सचिन मिश्रा said...
25 October 2008 at 6:54 PM  

Bahut badiya, diwali ki hardik subhkamnayein.

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Ratan Singh Shekhawat said...
25 October 2008 at 7:29 PM  

अरे भाई बहुत अच्छा लगा आप के यहां आ कर , यह तो अपना घर ही लगा, बिलकुल अपना घर लेकिन मेने थोडी तोड फ़ोड कर के अपने घर का नमुना बदल रखा है.चलिये बात फ़िर अभी तो आप का लेख भी नही पढा, लेकिन आज आप को .... बस इतना ही कहना है...

भाटिया जी आपका घर देख कर ही अनुसरण किया था लेकिन आपकी तरह तोड़ फोड़ कर नवीनीकरण नही कर पाए ....
दीपावली की हार्दिक बधाईयाँ और शुभकामनाये !

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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...
26 October 2008 at 2:46 AM  

सुन्दर कथा... आनन्द आ गया। साधुवाद।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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अनूप शुक्ल said...
26 October 2008 at 3:42 AM  

सुन्दर कथा!

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BrijmohanShrivastava said...
26 October 2008 at 4:31 AM  

प्रिय भाटिया जी /दीवाली के अवसर पर बहुत अच्छी शिक्षाप्रद कहानी प्रस्तुत की /बिल्कुल सत्य है /कर्म प्रधान विश्व रचि रखा /लेकिन कर्म और अकर्म [दुष्कर्म इत्यादि ]में हमें अपने विवेक से काम लेना चाहिए /परहित सरिस धर्म नही भाई /और पापाय पर पीडनम् का ध्यान रखना चाहिए / शिक्षाप्रद कहानिया और द्रष्टान्त इसी लिए होते है कि साधारण व्यक्ति भी गूढ़ अर्थ को सहजता से समझ सके /बहुत बहुत बधाई

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डा. अमर कुमार said...
26 October 2008 at 5:54 AM  

बेहतरीन है यह, अन्य जगहों की निर्थक हा हा ठीठी से !
बधाई लें, इतनी अच्छी रचना देने के लिये..

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हिन्दी - इन्टरनेट said...
26 October 2008 at 10:12 AM  

sundar kahani..

आपको सपरिवार दीपावली व नये वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये

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निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...
26 October 2008 at 11:32 AM  

अच्छी रचना बहुत सुंदर और शिक्षाप्रद कहानी.दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें.

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सौरभ पंडित said...
26 October 2008 at 3:36 PM  

काफी प्रेरक है कथा,सुनो बंधु तुम राज
जिस पर मां की हो कृपा, उसके सिर हो ताज
हो उसके सिर ताज, रहे वह बनकर रानी
राजपाश में रहे, राज की दिलवर जानी‍
दीपावली पर आप और आपके पूरे परिवार को शुभकामनाएं.

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दीपक "तिवारी साहब" said...
26 October 2008 at 5:10 PM  

बहुत बढिया कहानी ! दीपावली की आपको हार्दिक शुभकामनाएं !

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Zakir Ali 'Rajneesh' said...
27 October 2008 at 9:19 AM  

प्रेरक कहानी।
दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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jayaka said...
28 October 2008 at 7:10 AM  

bahut achchhi jaankaari ...aur saath mein achchhi ka sanyojan!... bahut achchha laga!...Dipawali ki Dhheron,hardik shubhkamanayen!

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ताऊ रामपुरिया said...
28 October 2008 at 8:58 AM  

परिवार व इष्ट मित्रो सहित आपको दीपावली की बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं !
पिछले समय जाने अनजाने आपको कोई कष्ट पहुंचाया हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ !

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 6:51 AM  


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