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अगर आप ट्रेन से कही यात्रा करे, ओर बाहर देखने पर हजारो लोग आप की तरफ़ अपने पिछले हिस्से को नगन दिखाये तो केसा लगेगा???

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अरे शर्माये नही.... यहां देखे ओर पढे तो सही....
 अमरीका के दक्षिणी कैलिफोर्निया शहर में एक ऐसी जगह है जहां हर साल लोग एक परंपरा का निर्वाह बड़े मजे के साथ कर रहे हैं. इसमें स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले लोग पास गुजरने वाली ट्रेनों के सामने अपनी पैंट उतारते हैं और अपना नितंब दिखाते हैं..... पुरी खबर के लिये आप को यहां जाना होगा:) लेकिन इन्हे क्या मिलेगा?? पोर कही भारत मै भी इसे एक दिन के रुप मै ना मनाने लग जाये लोग

16 टिपण्णी:
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महेन्द्र मिश्र said...
11 July 2010 at 6:29 PM  

खैर हमारे देश में ऐसा होना संभव नहीं है ...यदि ऐसा होता है तो भारतीय दर्शकों की संख्या अधिकाधिक होगी...हा हा हा

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नीरज जाट जी said...
12 July 2010 at 4:29 AM  

कौन कहता है कि हमारे देश में यह परम्परा नहीं है। अरे भाई, सुबह-सुबह निकल पडिये किसी भी ट्रेन में बैठकर, पटरियों के बराबर में बहुत लोग बैठे मिलेंगे। हमारे यहां यह आयोजन सालाना नहीं होता, बल्कि दैनिक होता है।

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निर्मला कपिला said...
12 July 2010 at 5:26 AM  

हा हा हा नेरज की बात सही है। आभार।

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अन्तर सोहिल said...
12 July 2010 at 8:05 AM  

यहां भारत में तो रोज ही इस परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं लोग।
रेल की पटरी पर बैठे हुये उसी पटरी को पकड कर इस तरह से जोर लगाते हैं कि लगता है पटरी ही उखड जायेगी।

प्रणाम

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अन्तर सोहिल said...
12 July 2010 at 8:15 AM  

अजीब दुनिया गजब लोग

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RAJWANT RAJ said...
12 July 2010 at 1:21 PM  

bhart me rel ya sdko ke kinare subh subh baithna jrurt our mjboori dono ko drshata hai lekin mouj masti ke liy is trh ka vyvhar mansikta ko drshata hai jise suvidha ke liye prmpra ka nam de diya jata hai .
raj saheb aapki kai post bhut achhi lgi . aage bhi pdhna chahungi .

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डॉ महेश सिन्हा said...
12 July 2010 at 5:13 PM  

किसी ने कहा था भारत एक सबसे बड़ा खुला प्रसाधन वाला देश है

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पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...
13 July 2010 at 1:13 PM  

कमाल है! कैसी अजीबोगरीब परम्पराएं हैं :)

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Divya said...
14 July 2010 at 1:00 PM  

majedaar parampara ! achha hua apne desh mein nahi hai !

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Vinay Prajapati 'Nazar' said...
16 July 2010 at 4:03 PM  

उफ़ उफ़ उफ़

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श्याम कोरी 'उदय' said...
17 July 2010 at 12:26 PM  

...क्या बात है!!!

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Gagan Sharma, Kuchh Alag sa said...
18 July 2010 at 3:54 PM  

अपने यहां इस परंपरा का निर्वाह वर्षों से है। पर यह नहीं समझ आता कि रेल पटरियां ही क्यों उपकृत होती हैं? वे ही क्यों शापित हैं इस उपक्रम से?

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ज्योति सिंह said...
19 July 2010 at 10:32 PM  

niraj ji ki baton se to hansi fut padi ,aapne is zabardast parmpara ki jo hame jaankari di iske liye aabhar .

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दीपक 'मशाल' said...
22 July 2010 at 2:02 AM  

हा हा हा...

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Akshita (Pakhi) said...
22 July 2010 at 1:26 PM  

Shameful....

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:17 AM  



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