feedburner

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इस लेख को जो भी आप नाम देना चाहे दे.....

.

यह लेख कोई कहानी नही, एक सच्ची बात है जो मेरे संग बीती, लेकिन मेरे पास इसे कोई नाम नही जो दे सकूं...

यह कहानी आज से नही करीब २५,२६ साल पहले शुरु होती है, उस समय मेरी शादी नही हुयी थी, ओर मेरे पास एक कमरा था साथ मै एक किचन ओर बाथरुम  था, मेरे लिये कमरा बहुत उचित था, मै उन दिनो अकेला रहता था, शाम को कभी दोस्त मित्र आ जाते, ओर शुक्र वार ओर शनिवार को ज्यादा तर बाहर ही रहता, मस्ती भरे दिन फ़िक्र ना फ़ाका,कमरे का किराया बहुत कम था, आमदन बहुत थी, खुल कर खर्च करना, ओर खुल कर पेसा घर भेजना, लेकिन मेरी एक आद्त बहुत खराब है मै हर किसी की मदद जरुर करता हुं.

ओर इसी आदत के कारण कई लोगो ने मुझ से पेसे उधार लिये ओर आज तक दिये नही, फ़िर मुझे थोडी अकल आ गई, लेकिन तब तक अन्य कई दोस्तो ने फ़िर भी मुझे टोपी पहना ही दी,फ़िर मेने कसम उठाई की अब कभी किसी को पैसा उधर नही दुंगा. उन्ही दिनो मुझे एक भारतीया सडक पर मिला जो -२० C मै भी एक स्वेटर पहने था, उस का खास दोस्त मिलने आया उसे संग ले कर, ओर उसे मेरे घर उसे छोड गया, ओर बोला मै अभी आया... लेकिन फ़िर कभी भी नही आया, बात चीत से पता चला कि वो दो चार दिन पहले ही भारत से आया है, उस की रोनी शकल देख कर  मैने उसे कहा अगर तुम्हारे पास यहां का वीजा है, तो तुम जितने दिन चाहो मेरे घर पर रह सकते हो, ओर जो चाहो खाओ, वो भाई दो महीने मेरे पास रहे, मैने उन्हे गर्म कपडे भी ले कर दिये, ओर खाने पीने की कोई कमी नही आने दी, ओर छोटे भाई से भी ज्यादा प्यार दिया.

फ़िर उसे भारत की याद  सताने लगी, ओर एक दिन भीगे मन से उसे अलबिदा कह दिया, लेकिन जाते जाते उस ने अपना भारत का पता दिया, ओर भारत पहुचते ही उस का फ़ोन आया उस के परिवार ने बहुत धन्यवाद किया कि अगर आप ने इसे ना समभाला होता तो सर्दी मै इस का क्या होता, लेकिन मेरे लिये यह साधारण था, ओर मै इसे भुल सा गया, जब भारत गया तो उस ने जबर्द्स्ती अपने घर बुलाया , जब उसक े घर गया तो सब ने बहुत सेवा की , ओर मेरा धन्यवाद किया.

उस के बाद कभी कभार उस से बात चीत हो जाती, एक दो बार मेरी गेरहाजरी मै वो लडका मेरे मां बाप के पास गया  , उन का हाल चाल पूछा, मेरे साथ कभी कभार फ़ोन पर बात हो जाती, फ़िर पांच छै साल हम फ़ोन पर भी नही मिले, जब मेरे पिता जी गुजरे तो उस से मुलाकात हुयी, फ़िर फ़ोन पर एक आध बार बात हुयी, मां गुजरी तो दोबारा उस से मुलाकात हुयी, एक रात उस के घर रुकना हुआ, सुबह जब मुझे एयर पोर्ट छोडने आया तो बोला कि क्या आप के पास कुछ पेसे है? तो मैने पहले तो उसे मना करना चाहा..... लेकिन इतनी लम्बी जानपहचान ओर उस के प्यार को याद कर के मना ना कर पाया, ओर उसे एक हजार € ( करीब ७० हजार रुपये) दे दिये, उस का कहना था कि अगली बार जब भी आप ऎयर पोर्ट पर उतरेगे आप को यह पेसे मै यही दे दुंगा:

अब मुझे तो उस पर कोई शक नही था, फ़िर छै महीने बाद भारत आने लगा तो मैने बीबी से कहा कि मुझे इस बार पेसे साथ ले जाने की जरुरत नही वो पेसे तो ले ही आयेगा!!! लेकिन बीबी ने फ़िर भी जबर्दस्ती कुछ पेसे मुझे दे दिये, ओर कुछ हजार रुपये भी मेरे पास बचे थे, ओर मेरा क्रेडिट कार्ड भी दे दिया की कि  कभी  भी जरुरत पड सकती है, जब भारत एयर पोर्ट पर उतरा तो उस दोस्त ने एक पेसा भी नही दिया, मैने शर्माते शरमाते उस से कहा कि मुझे कुछ रुपये चाहिये, ओर उस ने १० हजार रुपये मुझे दिये........ फ़िर मेरा क्रेडिट कार्ड ओर बीबी के दिये पेसे काम आये, अब जब भी उस से पेसे मांगता हुं तो कोई ना कोई बहाना बनाता है.

मेने तो उस की मदद हर बार कि बिना मतलब के , अब क्या उसे इस बार मदद दे कर मैने बेवकुफ़ी की है, अगर हां तो शायद यह मदद मेरी तरफ़ से  हर इंसान के लिये अंतिम होगी, क्योकि इतने सालो का विशवास क्या पैसो के लिये ही था? क्या सच मै इंसानियत इस दुनिया मै खत्म हो गई, अब वो मुझे पैसा दे या ना दे लेकिन उस के कारण जो मैरा विशवास खोया है , उस का मुझे बहुत दुख है, आज उस ने कल मुझे १५ हजार देने का वादा किया है, जो वो यह वादा करीब दो महीनो से करता आ रहा है.........

अब आप ही इस कहानी को जो चाहे नाम दे, क्या अब मै किसी असहाय की मदद करुंगा??? कभी नही, किसी जरुरत मंद को पैसा दुंगा ??कभी नही

26 टिपण्णी:
gravatar
दीपक 'मशाल' said...
26 March 2010 at 1:49 AM  

Bahut dukh hua ye sab jankar sir.. aise hi logon ki wajah se aaj insaan ka insaan par se hi bharosa uthta ja raha hai.

gravatar
Suman said...
26 March 2010 at 2:16 AM  

nice

gravatar
वाणी गीत said...
26 March 2010 at 2:17 AM  

विश्वास में ऐसे मंजर देखने को मिलते है कभी- कभी ,
इसके बाद दूसरों पर विश्वास करना कठिन हो जाता है
मगर उम्मीद पर दुनिया टिकी रहती है ...मेरी आशावादिता यही कहती है कि यदि हम अच्छे हैं तो ऐसा तो नहीं है कि ईश्वर ने सिर्फ हमें ही अच्छा बनाया है ...

gravatar
निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...
26 March 2010 at 2:37 AM  

यकीनन यह बहुत बुरा अनुभव है भाटिया साहब.
मैंने भी अपने कुछ परिचितों की मदद उस वक़्त की जब मेरे पास पैसों की बहुतायत नहीं थी लेकिन पैसा वापस नहीं लौटा.
अब तो दिल को कठोर कर दिया है लेकिन कमबख्त पसीजने से बाज़ नहीं आता.

gravatar
बी एस पाबला said...
26 March 2010 at 2:38 AM  

दुनिया रंग बिरंगी

gravatar
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
26 March 2010 at 3:14 AM  

निश्चित ही यह एक बुरा अनुभव है और उस के परिणाम और भी बुरे कि बहुत से लोग जिन्हें सहज ही सहायता मिलती वे वंचित हो गए।

gravatar
Udan Tashtari said...
26 March 2010 at 4:17 AM  

यही होता है..इसी का नाम दुनिया है!! क्या कहें.

gravatar
Vivek Rastogi said...
26 March 2010 at 5:10 AM  

बिल्कुल ऐसे ही लोगों के कारण विश्वास उठ जाता है, और जिनके पास पैसा होता है वे लोग भी ऐसी ही हरकतें करते हैं, सब पैसे के यार हैं, विश्वास और दोस्ती के नहीं।

gravatar
ताऊ रामपुरिया said...
26 March 2010 at 6:37 AM  

इसी आदत के कारण कई लोगो ने मुझ से पेसे उधार लिये ओर आज तक दिये नही, फ़िर मुझे थोडी अकल आ गई, लेकिन तब तक अन्य कई दोस्तो ने फ़िर भी मुझे टोपी पहना ही दी,फ़िर मेने कसम उठाई की अब कभी किसी को पैसा उधर नही दुंगा.

अब समझ आया कि हमे आप उधार देना बंद क्युं कर दिये हो.:)

रामराम.

gravatar
पी.सी.गोदियाल said...
26 March 2010 at 7:18 AM  

भाटिया साहब,
आपने यह नहीं बताया कि वह आजकल करता क्या है, यह भी हो सकता है कि उसके पास लौटने के लिए पैसे न हो क्योंकि जैसे आपने कहा भारत आने के बाद वह आपके माता पिटा से भी मिलने गया, आपको एअरपोर्ट छोड़ने /लेने गया तो इससे यह साबित होता है कि वह बाई नेचर अहसान फरामोश नहीं है, आपने जो मदद की उसे याद है ! रही बात नेकी की तो मै तो यह मानता हूँ कि कोई आपके किये का अहसान माने न माने मगर आपको देर सबेर अच्छाई का फल अवश्य मिलता है!

gravatar
डॉ महेश सिन्हा said...
26 March 2010 at 7:48 AM  

इस तरह के लोगों के ही कारण आपसी विश्वास में कमी आई है

gravatar
Dr. Smt. ajit gupta said...
26 March 2010 at 8:02 AM  

हमें हमारी एक मित्र ने सलाह दी थी और उसे हमने आज तक गाँठ में बांध रखा है। कोई आपसे पैसा मांगे तो आप उसे इतना ही दो जितना देकर भूल सकते हो। नहीं तो आपकी दोस्‍ती भी जाएगी और आपका विश्‍वास भी। इसलिए हम तो उतना ही देते हैं जितना दान दिया जा सके।

gravatar
kunwarji's said...
26 March 2010 at 8:35 AM  

godiyaal ji se sahmat!

anubhav kaisa bhi ho bas wo hi apna hota hai.
kunwar ji,

gravatar
श्याम कोरी 'उदय' said...
26 March 2010 at 1:40 PM  

....ये भी संभव है कि वह अब कहीं चौक-चौराहे पर बैठकर भीख मांग रहा हो ...वैसे भी अहसानफ़रामोशों की संख्या दिन-व-दिन बढते जा रही है ....."टोपीबाजी : एक हुनर"!!!!!

gravatar
rashmi ravija said...
26 March 2010 at 2:35 PM  

यह तो सही है ,ऐसे लोगों के कारण, मदद करने का वो जज़्बा ख़त्म हो जाता है...फिर भी आपने इतने लोगों की मदद की है...सबने तो ऐसा नहीं किया होगा, फिर इस अनुभव को ही सर्वोपरि क्यूँ रखें?...कुछ सुखद अनुभव भी हुए होंगे ,जहाँ लोगों ने आपकी मदद को आजीवन याद किया होगा...बस वैसे ही अनुभव याद रखें...और इस दोस्त को यह अहसास जरूर दिला देन कि उसने बहुत गलत किया .

gravatar
dhiru singh {धीरू सिंह} said...
26 March 2010 at 3:38 PM  

प्यार गया पैसा गया और गया व्यव्हार
दर्शन दुर्लभ हो गये जब से दिया उधार

gravatar
डॉ. मनोज मिश्र said...
26 March 2010 at 4:21 PM  

आप सही हैं,गलत वह है.इन्ही कारणों से सब के ऊपर से विश्वास खत्म हो जाता है.

gravatar
प्रकाश गोविन्द said...
26 March 2010 at 7:21 PM  

rashmi ravija ji kee baat hi mai dohraane wala tha. sukhad anubhav yaad kariye.

gravatar
खुशदीप सहगल said...
26 March 2010 at 8:20 PM  

राज जी,
वो वाकई नामाकूल होगा...आपकी ये पोस्ट पढ़कर फिल्म दिल्ली-6 याद आ गई...उसमें एक किरदार हमेशा नौकर को बेवकूफ दिखाने के लिए सबके सामने पूछता है...दस रुपये का एक नोट लेगा या एक एक के दो सिक्के..नौकर हमेशा कहता...मैं बेवकूफ थोड़े न हूं जी, मैं एक क्यों लूंगा, मैं तो दो लूंगा...और वो दो सिक्के ले लेता है...फिल्म के आखिर में नौकर राज़ खोलता है कि अगर मैं कभी दस का नोट ले लेता तो आप दोबारा कभी थोड़े ही मुझसे सवाल पूछते...इसलिए मैं हमेशा एक-एक के दो सिक्के ही लेता रहा...

जय हिंद...

gravatar
BrijmohanShrivastava said...
27 March 2010 at 9:57 AM  

२६ साल से आप उस घटना को याद रखे हुए है |कहानी का शीर्षक है नेकी कर दरिया में डाल

gravatar
दिगम्बर नासवा said...
27 March 2010 at 12:41 PM  

ऐसा अक्सर होता है भाटिया जी ... अकल्मंद ये कहते हैं की विश्वास नही करना चाहिए ... पर मेरा मानना है की जिसकी आदत विश्वास की हो वो हमेशा करता रहेगा .. जो मदद करना जानता है वो हमेशा करेगा ...

gravatar
अन्तर सोहिल said...
29 March 2010 at 12:38 PM  

ऐसे ही कुछ लोगों की वजह से सचमुच के जरूरतमंद की भी सहायता करने का मन नही करता है जी।
मेरे साथ तो ऐसे कई वाकिये हो चुके हैं, मगर क्या करूं आदत से मजबूर जो हूं।

प्रणाम

gravatar
Akanksha~आकांक्षा said...
2 April 2010 at 5:27 AM  

यह दुनिया ऐसी ही है..
__________
"शब्द-शिखर" पर सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं के लिए आरक्षण

gravatar
Akanksha~आकांक्षा said...
2 April 2010 at 5:32 AM  

यह दुनिया ऐसी ही है..

_______________
"शब्द-शिखर" पर सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं के लिए आरक्षण

gravatar
Vaibhav said...
9 April 2010 at 7:14 PM  

भाटिया जी, आपने अपनी तरफ से तो सब बतय पर उसके बारे मे नही बताया कि वो अभी किस परिस्थिति मे है, क्या आपने पैसे देते समय ये सोचा कि वो ये पैसे क्यो मांग रहा है? क्या वो अभी इस स्थिति मे है कि पैसे वापस कर सके। मुझे गलत मत समझियेगा मेरा उद्देश्य आपको गलत साबित करने का नही है बस मै किसी निर्णय पर जाने से पहले उस व्यक्ति का पहलू भी जानना चाहता हुं।

gravatar
P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:24 AM  



दोस्त की बीवी

डॉली और कोचिंग टीचर

कामवाली की चुदाई

नाटक में चुदाई

स्वीटी की चुदाई

कजिन के मुहं में लंड डाला

Post a Comment

Post a Comment

नमस्कार,आप सब का स्वागत हे, एक सुचना आप सब के लिये जिस पोस्ट पर आप टिपण्णी दे रहे हे, अगर यह पोस्ट चार दिन से ज्यादा पुरानी हे तो माडरेशन चालू हे, ओर इसे जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा,नयी पोस्ट पर कोई माडरेशन नही हे, आप का धन्यवाद टिपण्णी देने के लिये

टिप्पणी में परेशानी है तो यहां क्लिक करें..
मैं कहता हूं कि आप अपनी भाषा में बोलें, अपनी भाषा में लिखें।उनको गरज होगी तो वे हमारी बात सुनेंगे। मैं अपनी बात अपनी भाषा में कहूंगा।*जिसको गरज होगी वह सुनेगा। आप इस प्रतिज्ञा के साथ काम करेंगे तो हिंदी भाषा का दर्जा बढ़ेगा। महात्मा गांधी अंग्रेजी का माध्यम भारतीयों की शिक्षा में सबसे बड़ा कठिन विघ्न है।...सभ्य संसार के किसी भी जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"महामना मदनमोहन मालवीय