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अनार कली कहां चली.....

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भाई ना तो हम कवि है, ओर ना ही शायर, लेकिन इन सात दिनो मै इतने शेर पढे, ओर इतनी बाते पढी की मजा आ गया...
जब हम रोहतक जा रहे थे तो जेसे जेसे ट्रको पर, ट्रालियो पर स्कुटरो पर ओर रिक्क्षा पर नजर पडती तो कुछ ना कुछ पढने को मिल जाता ओर सफ़र भी जल्द ही खत्म भी हो जाता, अगर कोई ट्रक दुर होता तो मन करता देखे इस के पीछे क्या लिखा है....
तो चलिये हम अपना पिटारा खोलते है इस अमुल्य बातो का.
अनार कली कहां चली.... बई तुझे क्या भाड मै जाये.
बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला.... यार हमे क्यो पढवा रहा है,
टीटू दी गड्डी.... अरे भाई हमे क्या किस की गड्डी हो.... ना हम टीटू को जानते है ना तुम्हे.
???? ????? अब तो पीछा छोड दे मै हो गई बच्चो वाली.... अजी शुकर करो इस उम्र मै भी आशिक मिल रहे है.
भाई हो तो ऎसा, हिसाब मांगे ना पेसा........ जरुर मेरे जेसा पागल होगा.
वाय वाय टाटा....... अबे जा बार बार हार्न बजा कर कान खराब कर रहा है.
आज मिले हो फ़िर कब मिलोगे प्रदेशी..... जरुर यह कोई जासुस होगा जो मेरे बारे जानता है
हार्न पलीज.... अबे अगर हार्न ऊखाड कर तुजे दे दिया तो मोके पर मै कहा से बजाऊंगा?
पीछे पीछे आने वाले तेरे इरादे है क्या..... नहि बताता
देखो मगर प्यार से...... बाप रे यहां भी धमकी
तेरे बच्चे जीये तेरा लहू पिये...... अब समझ मै आया आज कल के बच्चे यही से यह शिक्षा ले कर जाते है.
अबे आंखे फ़ाड फ़ाड कर क्या देख रहा है...... भाई हम ने झट से मुंह दुसरी तरफ़ फ़ेर लिया,
ओर सामने ही साईट मै एक बोर्ड लगा था साबधानी हटी दुर्गघटना घटी
बाकी याद आने पर.... तब तक आप भी कुछ बताये

26 टिपण्णी:
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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
19 February 2010 at 7:00 PM  

बहुत रोचक है यह। आप ने यह सब पढ़ा। आगे की सीट पर बैठने का यही लाभ है।

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महफूज़ अली said...
19 February 2010 at 7:00 PM  

हा हा हा हा हा हा....एक ट्रक देखा था ..... एकदम टूटा-फूटा हुआ.... कबाड़ सा..... उसके पीछे लिखा हुआ था...जंगल की रानी....

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महफूज़ अली said...
19 February 2010 at 7:04 PM  

हमारे यहाँ ट्रक पर "सट्ला त गइला बेटा" भी लिखा रहता है..... पढ़ कर बहुत हंसी आती है....

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महफूज़ अली said...
19 February 2010 at 7:04 PM  

बहुत अच्छी लगी आपकी पोस्ट.... मज़ा आ गया....

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Tej Pratap Singh said...
19 February 2010 at 7:14 PM  

sundar rachna

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पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...
19 February 2010 at 8:10 PM  

अरे ये तो फुरसतिया जी के जैसी एक लाईना हो गई... बडी अच्छी तुक्क भिडाई आपने :)

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अविनाश वाचस्पति said...
19 February 2010 at 8:38 PM  

आप जिस वाहन पर सवार थे
उसके पीछे लिखा था
nice

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Udan Tashtari said...
19 February 2010 at 11:13 PM  

एक बार रवि रतलामी जी ऐसे ही ट्रक शायरी बोरा भर कर लाये थे. मजेदार कमेंटस हैं आपके उन शायरी पर. :)

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दीपक 'मशाल' said...
20 February 2010 at 12:36 AM  

१३ के फूल ११ की माला.. बुरी नज़र वाले तेरा मुह काला..

लटक मत.. टपक जायेगा...

के घर कब आओगे...

लिखा परदेश किस्मत में वतन को याद क्या करना
जहाँ बेदर्द हाकिम हो वहां फ़रियाद क्या करना..

चलती है गाड़ी.. उडती है धूल
जलते हैं दुश्मन... खिलते हैं फूल..

ab comment aap karna :)

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निर्मला कपिला said...
20 February 2010 at 5:01 AM  

हा हा हा बहुत रोचक यादें ले कर गये हैं भारत से क्या वहाँ सब को सुनाते हैं क्या कहते हैं वहाँ के लोग इस बारे मे ये बतायें । शुभकामनायें

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seema gupta said...
20 February 2010 at 5:10 AM  

बेहद रोचक लगा आपका ये संस्मरण भी...आभार
regards

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ताऊ रामपुरिया said...
20 February 2010 at 5:25 AM  

देखा आपने रोहतक आने का फ़ायदा? मुफ़्त का मनोरंजन. अब बाकी के भी लिखिये.:)

रामराम.

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अन्तर सोहिल said...
20 February 2010 at 7:12 AM  

कोई पूछे तो कह देना
आई थी चली गई

प्रणाम

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अन्तर सोहिल said...
20 February 2010 at 7:14 AM  

मालिक की गाडी, ड्राईवर का पसीना
चलती है रोड पे, बनके हसीना

प्रणाम जी

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Arvind Mishra said...
20 February 2010 at 7:35 AM  

हा हा सफ़र जीवंत हो गया -ब्लॉग जगत के कितने चेहरे याद आये ?

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वन्दना said...
20 February 2010 at 11:39 AM  

hahahaha.......bahut hi badhiya laga aapka andaz-e-bayan.

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सुशील कुमार छौक्कर said...
20 February 2010 at 12:31 PM  

कहीं लिखा देखा था "देख जाट के ठाठ"

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ज्योति सिंह said...
20 February 2010 at 12:34 PM  

maza laga diya padhkar khoob hansi aai aur ab to safar me kahi bhi aesa kuchh nazar aayega to aapke is lekh ki yaad taza ho jayegi ,ha ha .....

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डॉ. मनोज मिश्र said...
20 February 2010 at 1:22 PM  

रोचक है...........

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M VERMA said...
20 February 2010 at 2:43 PM  

बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला

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दिगम्बर नासवा said...
21 February 2010 at 7:35 AM  

भाटिया जी .... नमस्कार ..... ट्रकों के पीछे लिखे को पढ़ने में बहुत ही मज़ा आता है ....कई बार बहुत लाजवाब शेर पढ़ने को मिल जाते हैं ....ऐसे ही एक बार मैने भी पढ़ा था .....
मैं मुसाफिर हूँ मेरी सुबा कहीं शाम कहीं ......

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श्याम कोरी 'उदय' said...
21 February 2010 at 4:37 PM  

.... रोचक व दिलचस्प प्रस्तुति !!!

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kshama said...
27 February 2010 at 6:27 AM  

Ek truk ke peechhe likha tha," buree nazarwale,tere bachhe jiyen aur bade hoke tera khoon piyen"!
Holee ki anek shubhkanayen!

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रवीन्द्र प्रभात said...
27 February 2010 at 7:46 AM  

आप और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ...

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दिगम्बर नासवा said...
27 February 2010 at 8:38 AM  

आपको और आपके समस्त परिवार को होली की बहुत बहुत शुभ-कामनाएँ ......

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 4:26 AM  



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