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वसा से बचो, ज्यादा जियो...

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अजी ड्रा साहिब कहते है कि, फ़ेट यानि घी ओर घी से बनी चीजे कम खानी चाहिये.... लेकिन इस की शुरु आत तो नाशते से ही करनी पडेगी ना.....

20 टिपण्णी:
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RAJIV MAHESHWARI said...
3 March 2009 at 4:55 AM  

बस इतने से बटर से केसे काम चलेगा.
भूखे रहे जायेगे.........

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seema gupta said...
3 March 2009 at 5:15 AM  

"" यानि नाश्ते में कटोती.....सेहत के लिए तो करना ही पडेगा न.."

Regards

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विनय said...
3 March 2009 at 5:18 AM  

बहुत ही सुन्दर थीम चुनी है। अब यहाँ आना और भी अच्छा लग रहा है!

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चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें

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आलोक सिंह said...
3 March 2009 at 5:35 AM  

जोहार
ये बटर लगाना नहीं बल्कि ब्रेड को बटर दिखाने जैसा है . जब तक ब्रेड से मक्खन टपकता नहीं, स्वाद ही नहीं आता .

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Udan Tashtari said...
3 March 2009 at 5:50 AM  

क्या महाराज?? घर आने का आमंत्रण दिये हो और नाश्ते में ये??

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Science Bloggers Association said...
3 March 2009 at 5:56 AM  

नाश्‍ते में फैट खाएंगे, डाक्‍टर के पास जाएंगे, अपनी जेब कटाएंगे, ढेर दवाएं लाएंगे। लेकिन नाश्‍ते में फैट खाएंगे।

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neeshoo said...
3 March 2009 at 5:56 AM  

रूखा सूखा खाईके ठड़ा पानी पिऊ । यही ठीक रहेगा ।

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सुशील कुमार छौक्कर said...
3 March 2009 at 6:42 AM  

कमाल है जी।

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mehek said...
3 March 2009 at 6:44 AM  

bahut badhiya butter stick:)

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ताऊ रामपुरिया said...
3 March 2009 at 6:48 AM  

वाह जी ये कोई बात हुई? ये तो फ़ेवी स्टिक को बटर बता कर काम चलाने का कह रहे हैं?

अजी बटर चाहिये असली और वो भी मिट्टी की कुल्हडी में>:)

रामराम.

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रंजना [रंजू भाटिया] said...
3 March 2009 at 6:48 AM  

बस इतना सा :)

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Arvind Mishra said...
3 March 2009 at 8:28 AM  

लेबल गलत चिपक गया क्या ?

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दिगम्बर नासवा said...
3 March 2009 at 8:42 AM  

खूबसूरत तस्वीर जनाब, पर स्टिक वाला मक्खन है, चिपक तो नहीं जायेगा आंतों के साथ

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डॉ .अनुराग said...
3 March 2009 at 8:46 AM  

आईला !

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P.N. Subramanian said...
3 March 2009 at 9:50 AM  

हम तो मक्खन और घी खा खा के मरना चाहेंगे.

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शोभा said...
3 March 2009 at 12:22 PM  

बढ़िया सुझाव है।

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रंजन said...
3 March 2009 at 3:37 PM  

पर कान्हा तो खुब माखान खाता ्था...:)

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लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...
3 March 2009 at 4:07 PM  

Very good stick ...

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ताऊ रामपुरिया said...
4 March 2009 at 4:20 PM  

यह सोच के आये थे वापस की अब तक तो बटर की कुल्हडी आ गई होगी पर यहां तो अब भी फ़ेवी स्टिक ही है.

रामराम.

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 5:18 AM  


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