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शराबी जमीं पै

.

एक शराबी फ़िल्म **तारे जमीं पर** देख कर आधी रात को घर लोटा ता है ओर साथ साथ मे गुनगुना रहा है... आप भी सुने अरे नही मेने सुना ओर अब यहां लिखा दिया अब आप भी पढे उस गरीब शराबी के मन का दुख....
शराबी जमीं पै.....


मै कभी बतलाता नहीं...
ठेके पे रोजाना जाता हूं मै मां.......
युं तो मे दिखलाता नही.....
दारू पी कर रोज आता हुं मै मां........
तुझे सब हे पता, हें ना मां....
तुझे सब हे पता, मेरी मां....


ठेके पै युं ना छोडो मुझे......
घर लोट के भी आ ना पाऊं मै मेरी मां.....
पाऊआ लेने भेज ना इतना दुर मुझे तु....
नशे मे घर भी ना भुल जाउ मै मां.....
क्या इतना बुरा हुं मै मां.....
क्या इतना बुरा हुं मै मां.... मेरी मां....


स्काच मे इतना पीता नही.....
एक पेग से सहम जाता हु मै मां
चेहरे पे आने देता नही....
लेकिन कभी कभी लुडक जाता हुं मै मां....
क्या इतना बुरा हुं मै मां.....
क्या इतना बुरा हुं मै मां.... मेरी मां.... ............................

21 टिपण्णी:
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दीपक said...
8 October 2008 at 5:13 AM  

हा हा हा!!क्या खुब है जी

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Anil Pusadkar said...
8 October 2008 at 5:19 AM  

क्या बात है,भाटिया जी,

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seema gupta said...
8 October 2008 at 5:22 AM  

मै कभी बतलाता नहीं...
ठेके पे रोजाना जाता हूं मै मां.......
युं तो मे दिखलाता नही.....
दारू पी कर रोज आता हुं मै मां........
तुझे सब हे पता, हें ना मां....
तुझे सब हे पता, मेरी मां....
"ha ha ha ha ha ha kmal kitta sir je, mind blowing'

regards

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निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...
8 October 2008 at 5:28 AM  

स्काच मे इतना पीता नही.....
एक पेग से सहम जाता हु मै
चेहरे पे आने देता नही....
लेकिन कभी कभी लुडक जाता हुं मै
khoobasoorat kuch leek se hatakar . bahut joradar . dhanyawaad.

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रंजन said...
8 October 2008 at 6:20 AM  

bahut sahi kahaa..

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Shiv Kumar Mishra said...
8 October 2008 at 8:49 AM  

वाह! वाह!
बहुत बढ़िया. बढ़िया पैरोडी है. शराबी पूरा रोडी है.

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डॉ .अनुराग said...
8 October 2008 at 8:56 AM  

बहुत बढ़िया

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रश्मि प्रभा said...
8 October 2008 at 10:26 AM  

ha ha ha ...... maza aa gaya

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ताऊ रामपुरिया said...
8 October 2008 at 10:35 AM  

स्काच मे इतना पीता नही.....
एक पेग से सहम जाता हु मै मां
नहुत बेहतरीन ! तिवारी साहब आते ही होंगे ! :)

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दीपक "तिवारी साहब" said...
8 October 2008 at 11:22 AM  

ठेके पै युं ना छोडो मुझे......
घर लोट के भी आ ना पाऊं मै मेरी मां.....

अपन तो घर बैठ कर ही मजे लेते हैं सर !
अपनी पसंद की कविता लिखी आपने !
धन्यवाद !

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भूतनाथ said...
8 October 2008 at 11:31 AM  

हम तो शाकाहारी भूत हैं ! पीने पिलाने वालो से दूर रहते हैं !
अलबत्ता शरबत और वो भी काले शरबत के शौकीन हैं !
इतने दिन तिवारी जी के यहाँ रहे , इन्होने भी नही पिलाया ! :)

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Deepak Bhanre said...
8 October 2008 at 11:49 AM  

श्रीमान जी बहुत बढ़िया है .

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ज़ाकिर हुसैन said...
8 October 2008 at 11:56 AM  

भई पीते तो हम भी नहीं लेकिन लुढ़कते हुए बहुतों को देख लेते हैं.
वैसे पैरोडी पढ़कर मूड फ्रेश हो गया जी.
राज भाई को धन्यवाद, इतना mind blowing लिखने के लिए

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अशोक पाण्डेय said...
8 October 2008 at 5:39 PM  

स्काच मे इतना पीता नही.....
एक पेग से सहम जाता हु मै मां
चेहरे पे आने देता नही....
लेकिन कभी कभी लुडक जाता हुं मै मां....
क्या इतना बुरा हुं मै मां.....
क्या इतना बुरा हुं मै मां.... मेरी मां.... ............................
वाह, मजा आ गया इस पैरोडी को पढ़कर..धन्‍यवाद।

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jitendra said...
8 October 2008 at 7:21 PM  

हमारे छत्‍तीसगढ् मे तो शराबीयों ने भारत के लिए पीने मे कांस्‍य पदक जीता है
वाकई बढिया पैक मारा है आपने

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dhiru singh said...
9 October 2008 at 4:25 PM  

sunder sunder bhai ,wah bhai wah

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सतीश सक्सेना said...
11 October 2008 at 1:58 PM  

बहुत बढ़िया भाटिया जी !

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Dev said...
14 October 2008 at 2:52 PM  

मै कभी बतलाता नहीं...
ठेके पे रोजाना जाता हूं मै मां.......
युं तो मे दिखलाता नही.....
दारू पी कर रोज आता हुं मै मां........
तुझे सब हे पता, हें ना मां....
तुझे सब हे पता, मेरी मां....

Great Sir....Maja aa gaya...
Really Nice work aur kya kahoon mai
Suraj Ko Deepak Dekhane Ke Barabar hai Meri pratikriya....

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रामेश्वर पटले said...
20 May 2012 at 2:49 PM  

बहोत बढीया

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रामेश्वर पटले said...
20 May 2012 at 2:50 PM  

वाह भाटीयाजी बहोत बढीया

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 6:56 AM  


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