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दादी मां

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दादी मां आज बहुत खुश थी, आज तो गावं मे दादी के घर पर खुब रोनक थी, दादी के सारे बच्चे जो घर आये हुये थे, दोनो लडके अपने परिवार समेत आये थे. दोनो लडको के ३, ३ बच्चे थे, बहुये भी सुशील थी, फ़िर दोनो बेटिया भी अपने परिवार समेत आ गई, ओर आज तो चारो ननद भी आ गई थी परिवार समेत, ओर पुरे घर मे शादी जेसा माहोल था.

सभी बहुत खुश थे, बच्चे शोर मचा रहे थे, कभी इधर कभी उधर, बेटियां ओर बहुंयओ ने भी सारे काम आपिस मे बांट लिये कोई खाना बनाने का काम सम्भाल लेती हे तो कोई घर की साफ़ साफ़ाई मे लग गई, यानि सभी बहुत ही खुश ओर हो भी क्यो ना ? भाई आज से तीसरे दिन दादी का ९० जन्म दिन जो है.

घर मे आने जाने वालो का भी बहुत जम बाडा लगा था, दादी मां के बडे लडके ने जब अलमारी खोली तो उस मे से काफ़ी समान फ़ेकने के लिये निकाला, ओर उस समान के साथ, बडे लड्के के हाथ मे पुरानी दवा भी हाथ लगी जो दवा वह ओर उस का भाई पिछले समय मां को दे गये थे, लडके ने उन मे से पुरानी दवा जिन की मयाद खतम हो चुकी , अलग की ओर बाकी समान सम्भाल कर रख दिया. फ़िर बाहर आ कर इधर उधर देखा तो बुआ नजर आई, बेटा बोला बुआ यह दवा कही सही जगह फ़ेक देना किसी बच्चे के हाथ ना लग जाये. रात काफ़ी हो गई थी, फ़िर गावं मे तो वेसे भी जलदी रात हो जाती है.



दुसरे दिन दोनो भाई शहर मे किसी जरुरी काम से गये, ओर शाम को जब घर मे आये तो, गावं मे घुसते ही उन्हे कुछ अजीब सा लगा, जब घर की तरफ़ गये तो दंग रह गये उन के घर के सामने बहुत भीड, दोनो भाईयो के होश उड गये ओर वह जलदी से घर भागे, तो देखा दादी ओर बुआ दोनो ही मरणसन हालाल मे पडी हे, बिलकुल बेहोश..... दोनो भाईयो को कुछ समझ नही आया कि कुछ समय पहले तो सब राजी खुशी थे अचानक यह सब केसे हो गया, घर मे सभी सहम सहम बेठे थे, भाईयो ने अपनी बी्बीयो से पुछा, बच्चो से पुछा किसी को कुछ पता नही था. क्या हुआ ओर यह अचानक केसे हुआ.



फ़िर भी दोनो भाईयो ने हिम्मत की ओर मां को ले कर रोहतक मेडिकल कालेज पहुंच गये, वहां डाकटरो ने जलदी से चेक किया, ओर उन्हे खुब उलटियां करवाई ओर बताया इन्होने कोई गलत वस्तु खा ली य किसी ने खिला दी हे.लेकिन आप घबराये नही,हमे बहुत उम्मीद हे इन दोनो के बचने की हाः अगर आप थोडा देर से आते तो बचना मुश्किल था.



दोनो बेटे ओर गावं के कुछ ओर लोग भी उन के साथ सारी रात मेडिकल कालेज के बाहर बेठे रहे, ओर बारी बारी से मां ओर दादी मां ओर बुआ को देख आते, ओर फ़िर सारी रात प्राथना करते बीत गई, सुबह सुबह जब छोटा लडका मां को देखने गया, तो थोडी ही देर मे वापिस आ गया ओर सब को दुर से इशारे बुला कर जल्दी से फ़िर अन्दर चला गया.अब सभी चिंतित मन से जलदी से अन्दर भागे ओर अंदर जाते ही सब की आंखे फ़टी रह गई.

छोटा कभी मां तो कभी बुआ से को गले लगा कर बच्चो की तरह से रो रहा था, ओर मां ओर बुआ भी खुब रो रही थी, लेकिन उन्हे पता नही था यहां केसे आ गई.जब सब से मिलना हो चुका ओर सभी को विशवास हो गया कि अब मां ओर बुआ को कुछ नही होगा, इतनी देर मे डाकटर साहब जी भी आ गये,

ओर उन्होने कहा अब हमे पुरी बात जाननी चाहिये, अगर किसी की साजिस हे तो यह केस बनता हे ,



इस लिये कपृया प सब हम लोगो को अकेला छोड दे, सभी लोग बाहर चले गये, डाकटर ने दोनो लडकॊ को भी बाहर भेज दिया.......... दादी की बात सुन कर डाकटर साहिब ने अपना सर पकड लिया, ओर दादी को बहुत कुछ समझाया. फ़िरसब को बुला कर वह बात बातई जिस से इस खुशी के मोके पर अचानक दुख के बादल छा गये.



असल मे जब बडॆ लडके ने बुआ को दवाईयो को फ़ेकने को कहा तो, अनपढ बुआ उन दवाओ को पलु मे बाध कर बेठ गई, दुसरे दिन जब दोनो मां बेटी अलग बेठी तो बुआ बोली मां तुम्हारा बेटा तो पेसे लुटाने लगा हे यह देखॊ कितनी कीमती दवा फ़ेकने को बोल रहा है, जेसे दवा मुफ़त मे आई हो, ओर फ़िर दोनो मां बेटी ने मिल कर आधी आधी दवा पानी के साथ खा ली, बाकी सारा नजारा आप के सामने.....

यह एक सच्ची बात हे, आप भी अपने बुजुर्गो को यह जरुर समझाये कि... ऎसा मत करे. ओर दवा को बच्चो ओर नादनो के हाथो से दुर रखें



फ़िर दादी का जन्म दिन ओर भी खुशी से मनाया गया, ओर वह डाकटर साहिब ओर वह नर्से भी आई जिन्होने उस रात मोत से लडकर दोनो को नयी जिन्दगी दी.

18 टिपण्णी:
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Arvind Mishra said...
4 October 2008 at 4:33 AM  

ओह साँसे रुकी रह गयी थीं -अंत भला तो सब भला -लाख टके की सीख तो मिली ही !

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सतीश पंचम said...
4 October 2008 at 4:39 AM  

ऐसी बातें अक्सर देहातों में होती हैं....मेरी जानकारी में जहां तक याद है एक महिला ने ईसी तरह अपने घाव पर कोई ज्यादा जलन करने वाली दवा लगा ली थी जिससे घाव जल्दी ठीक हो और यही विश्वास घातक बन गया कि जो दवा ज्यादा तकलीफ देती है वह जल्दी फायदा करती है....उस महिला को बाद में लंबे ईलाज का सामना करना पडा था । शायद अब भी वह महिला जिवित है, अभी कुछ ज्यादा जानकारी तो नहीं मिल पाई उसके बारे में।वह याद आपने फिर ताजा कर दी।

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ताऊ रामपुरिया said...
4 October 2008 at 5:07 AM  

अच्छी सीख मिली ! अंत आते २ लग रहा था की पता नही क्या निकलेगा पर भगवान् का शुक्र है की सुखान्त हो गया ! बहुत काम की बात बता आपने !

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दीपक "तिवारी साहब" said...
4 October 2008 at 5:10 AM  

भले बुजुर्ग हों पर बहुत अनपढ़ या भोले हों तो उन्हें इस तरह की जानकारी अवश्य दे देनी चाहिए !

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भूतनाथ said...
4 October 2008 at 5:11 AM  

बहुत उम्दा जानकारी ! धन्यवाद !

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परमजीत बाली said...
4 October 2008 at 5:52 AM  

सच है ऐसे हदसे कई बार नासमझी से हो ही जाते हैं।हम सभी को इस बात का बौत ध्यान रकना चाहिए।बहुत सही किया जो इस पोस्ट को दिया\इस से सभी सावधान हो जाएगे।आभार।

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Anil Pusadkar said...
4 October 2008 at 5:58 AM  

सही कहा आपने गांव मे लोगो और बुजूर्गों मे ये आदत होती है। याद रखने वाली बात बता दी आपने। आभार आपका।

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seema gupta said...
4 October 2008 at 6:32 AM  

" very interetsing story, the message of the story is very good and it is required also that knowledge should be given to the old people at home about these type of small small things which can result into a disaster, but jako rakhe saeyan, maar ske na koee...' thanks god.

regards

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रंजना [रंजू भाटिया] said...
4 October 2008 at 7:31 AM  

शिक्षा कितनी जरुरी है ..मुझे तो इस से यही समझ में आता है ..यह तो अच्छा हुआ जान बच गई ..

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डॉ .अनुराग said...
4 October 2008 at 8:08 AM  

महँगी दवाई ?अरे राज जी ये तो वही बात हो गई हमारे भी कई मरीज पूछ लेते है डॉ साहब इतनी महँगी दवाई है ,कोई ओर भी खा सकता है क्या ?

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दीपक said...
4 October 2008 at 8:41 AM  

सही कहा आपने मैने भी गांव मे ऐसा नमुना देखा है !!एक जागरुक पोस्ट है यह!!आभार

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रश्मि प्रभा said...
4 October 2008 at 9:11 AM  

bade bujurg aekon baar aisa karte hain,barbaad n ho,paisa laga hai-aisa sochkar,aur ......
daadi,bua ki zindagi bach gai,bahut aaram laga

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Deepak Bhanre said...
4 October 2008 at 10:39 AM  

जरूरी है की कोई भी दवाई बच्चे और बुजर्गों के हाथ मैं न पड़ने दी जाए . और यदि बुजर्ग शिक्षित नही है तो यह सावधानी और भी जरूरी हो जाती है . बढ़िया सीख दी है . आभार.

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रंजना said...
4 October 2008 at 2:39 PM  

bahut sahi kaha aapne.sachmuch hamse pahle wali pidhi walon,usme bhi khash kar ke mahilaon me jo sanchay pravritti hotee hai,kisi vastu ko yun hi fenk dena unse bardasht nahi hota aur chahe ghar ho ya apna shareer sabko kachdapetee banane me koi gurej nahi kartin.bhale iskee kitni bhi manhagi keemat kyon na chukani pade.
aapki post padh mujhe bhi bahut se vaakye yaad aa gaye.sach kahun to bujurgon kee bhvnaon ko maan dene ke chakkar me ghar ko kabaadkhana bante chupchaap dekhte rahna padta hai aur is tarah purani davai ya bhojan ya fir anya upyog kee vastuyen istemaal kar apne shareer kee durdasha ye kiye rahtee hain.ishwar kee kripa hai ki bahut badi durghatna abhi tak nahi ghati hai.

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Udan Tashtari said...
4 October 2008 at 7:03 PM  

बहुत बढ़िया सीख देती रोचक पोस्ट. आभार!!!

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Udan Tashtari said...
4 October 2008 at 7:03 PM  

बहुत बढ़िया सीख देती रोचक पोस्ट. आभार!!!

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Atmaram Sharma said...
6 October 2008 at 4:39 PM  

बहुत अच्छा लगा पढ़कर. जानकारी से भरी हुई रचना. धन्यवाद.

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 6:57 AM  


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