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क्या मे आत्महत्या कर लू ?

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यह मेल मुझे काफ़ी दिन पहले मिला था, लेकिन समय की कमी के कारण पोस्ट ना कर सका, आज इसे पोस्ट कर रहा हू,


मेरे इस बांलाग का मकसद यही हे की, इस मे मॆ लोगो के दिल का दर्द आप सब के सामने रखू, कहते हे ना खुशी बाटने से बढती हे, ओर दुख बांटने से कम होता हे, तो क्यो ना हम यह दुख इसी बहाने एक दुसरे से बांटे, मेरे किसी भी लेख मे आप को आशीलता नजर नही आयेगी, अगर कोई बात ऎसी होगी भी तो छुपे शव्दो मे, ओर इस बांलग पर जितने भी ऎसे लेख पोस्ट होते हे, वह उस लॆख भेजने वाले की इच्छा से ही होते हे,





आप जो भी सलाह टिपण्णई के रुप मे यहां देते हे वह सीधे उन तक पहुचती हे,आज का लेख अपनी तरह का एक अलग सा हे, ओर मेरा मकसद यह भी हे की ऎसे लेख जो यहां पोस्ट होते हे, शायद आप मे से भी किसी की यही मुसिबत हो तो आप को भी कोई नेक सलाह मिल जाये।





पिछले लेख मे डा० अमर जी ओर राम्पुरिया जी की सलाह उन साहब को बहुत उचित लगी ओर उन्होने दिल से आप सब को ओर डा० अमर जी, ओर राम पुरिया जी धन्यवाद दिया हे, ओर आने वाले समय मे एक अच्छा इन्सांन बनने का वचन दिया हे





आज का लेख एक सज्ज्न जो २९ साल के हे, इन का कल्पनित नाम चंदू लाल जी रख लेते हे,इन के दो बच्चे हे, पहला बच्चा ४ साल का ओर दुसरा बच्चा ३ साल का, इन के एक बडी बहिन हे, जो अपने ससुराल मे सुखी हे, माता पिता के साथ यह अपने परिवार समेत रहते हे, इन के पिता २ साल पहले सरकारी नोकरी से रिटायर हुये हे, मां बिमार रहती हे, ओर इन की बीबी भी घर मे ही रहती हे यानि घरेलू पत्नि (हाऊस बाईफ़) हे।





तो अब चलते हे इन की कहानी की ओर , अगर आप किसी के पास इन की मुसिबत का कोई रास्ता , उपाय,विधि हो तो आप इन की मदद जरुर करे।





चंदु लाल जी का कहना हे की इन के पिता बहुत ही सज्जन, ईमान दार ओर असुलो के पक्के इंसान हे, मेरी बहिन की शादी मे हमारे पिता जी ने एक पेसा भी दहेज नही दिया, ओर बहुत ही साधारण शादी की, आठ साल के करीब हो गये हे बहिन की शादी को वह अपने घर मे सुखी हे, बहिन की शादी के करीब दो साल बाद इन की शादी की बाते घर मे होने लगी थी.





पिता जी की सभी लोग, इज्जत बहुत करते हे, इस लिये अच्छे अच्छे (अच्छे का मतलब अमीर नही) घरो से एक दो रिश्ते आये, तो पिता जी की एक ही बात थी जब लडकी देखने जाना हे तो ना नही बोलनी,उस से पहले अपने घर मे सारी बात कर लो, दहेज भी बिलकुल नही लेना,ओर शादी भी बिलकुल साधारण होनी चहिये, लडकी के खान दान का पता लगा कर ही बात आगे बढेगी,एक दो लडकियो के फ़ोटो सभी ने देखे, एक सुन्दर सी लडकी सभी को पंसद आ गई, पतला शरीर, रंग सावला लेकिन देखने मे सुशील ओर शांत, बहिन ओर जीजा जी ओर उन के परिवार मे भी फ़ोटो दिखाई सब को पंसद आ गई, चन्दू लाल जी भी शर्मा कर हा कर रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत खुश।





पिता जी ने अपने तरीके से लडकी के परिवार के बारे पता किया, तो पिता जी भी निश्चिन्त हो गये, फ़िर एक दिन चंदु लाल जी , माता पिता ओर अपनी प्यारी बहिन के साथ बात पक्की करने गये,ओर वहां से सभी खुशी खुशी लोटे,फ़िर सगाई ओर एक दिन शादी भी हो गई, चन्दू लाल जी के घर पर बहुत रोनक थी, सभी मां को बधाई दे रहे थे, कि अब एक बेटी गई तो दुसरी आ गई, ओर चंदु लाल जी की माता का स्व्भाव भी बहुत ही अच्छा था, आज तक मुहहले मे किसी से ऊची आवाज मे बोली तक नही थी





बिलकुल सीधी साधी, लेकिन आज उसे कुछ सुझ ही नही रहा था, आज तो उस के पांव भी जमीन पर नही पड रहे थे, कभी इधर कभी उधर, सच मे आज चंदु लाल जी की मां फ़िर से जवान हो गई थी,करीब ४,५ दिन घर मे रोनक रही फ़िर सभी मेहमान जाने लगे, ओर आज बुआ भी अपने बच्चो के साथ चली गई , ओर शाम को दीदी भी जाने वाली हे, लेकि उस से पहले कुछ राश्मे पुरी करनी थी सो दीदी ओर बुआ ने सुबह सुबह ही कर ली, ओर शाम को दीदी को जीजा जी भी ले गये ।



अब घर पर हम चारो थे, मां ,पिता जी , मे ओर मेरी दुलहन, कभी कभार आस पडोस वाले बधाई देने आ जाते थे,हम सब थक भी बहुत गये थे, लेकिन घर मे काम भी बहुत बिखरा था, धीरे धीरे घर का सारा काम भी हो गया, फ़िर इस बीच कब दो सप्ताह बीत गये पता ही नही चला,

आखरी ओर अगला भाग कल सुबह

वेसे तो यह बात इतनी लम्बी नही हे लेकिन मे इसे एक कहानी के रुप मे लिख रहा हु, इस लिये आप सब से निवेदन हे की गल्तियो को माफ़ करे, ओर अपनी सही राय दे, शायद आप की सलाह से किसी का घर बच जाये, किसी की जिन्दगी सुधर जाये,यह सब हमारे किसी के साथ भी हो सकता हे

13 टिपण्णी:
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Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
5 September 2008 at 5:48 AM  

चलिए भाटिया जी, कल तक का इंतज़ार ही सही... कहानी रोचक है.

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संगीता पुरी said...
5 September 2008 at 6:44 AM  

बड़ी मुश्किल हॅ रही है , पढ़ पाने में । काले आधार में लिखे अक्षरों को मै सेलेक्ट कर पढ़ती हूं , पर आपके ब्लाग में तो सेलेक्अ ही नहीa हो रहा है।

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ताऊ रामपुरिया said...
5 September 2008 at 10:41 AM  

ठीक है सर जी ! हमको ये उम्मीद नही थी की इसका
दूसरा भाग भी अभी बाक़ी है ? यहाँ तक की कहानी तो
सुंदर ही है ! और सब अच्छा लग रहा है ! और आपने
भी एक कुशल कहानीकार की तरह ताना बाना बुना है !
इस लेखन के लिए बधाई ! और एक बात कहना चाहूँगा की
इस ब्लॉग को काले बैक ग्राउंड में पढ़ने में मुझे तो दिक्कत
पडी है ! सो अगर कोई विशष प्रयोजन ना हो तो कलर ठीक
करिए ! आँखों पर बहुत जोर पङता है ! आपके परम मित्र
तिवारी साहब भी यही आ गए हैं ! ये बोल रहे हैं मुझे तो
आप पढ़ कर सुनाओ ! तो अब एक बार इसको पढ़ना भी
पडेगा ! और तिवारी महाराज को सुनाना भी पडेगा
चलिए इस बहाने एक रिविजन और हो जायेगा ! अब
चंदुलाल जी की क्या समस्या है ? इसके लिए इंतजार करते हैं !

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दीपक "तिवारी साहब" said...
5 September 2008 at 10:46 AM  

भाटिया साहब ये ताऊ ने और आपने हमको भी ब्लागरिया बना दिया है !
ये कहीं छूत का रोग तो नही है ! ये पहली बार है जब पन्डताइन मायके गई है
और हम खुश हो रहे हैं ! सारा समय कंप्यूटर के सामने ही कट जाता है ! या
फ़िर ताऊ के आफिस में आकर भी कंप्यूटर दिखाई देता है ?
चंदुलाल जी की समस्या कल जान कर उनको राय दी जायेगी ! :)

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भूतनाथ said...
5 September 2008 at 11:05 AM  

हमको भी दुनिया दारी की कहानी में सुनकर
बड़ा मजा आया ! आगे की कहानी भी सुनाइये !
हम भी अपनी भूत बुद्धि के अनुसार जवाब अवश्य
देंगे ! कभी हमारे भूतमहल में भी आइये !

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Hyderabadi said...
5 September 2008 at 1:13 PM  

मैं भी सब से पहले येही राये देना चाहता हूँ के प्लीज़ काले बैक ग्राउंड को अपने ब्लॉग से ख़तम करें

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Udan Tashtari said...
5 September 2008 at 2:06 PM  

कल का इंतज़ार.....

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समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...
5 September 2008 at 4:01 PM  

kahani bahut achchi lagi . Raj ji agali kadi intajaar hai .

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राज भाटिय़ा said...
5 September 2008 at 4:53 PM  

आप सभी का धन्यवाद, अगर मे इस का काले वाला रंग बदलता हु तो बाकी सारे रंग अजीब लगते हे, इस लिये मेने इस मे अक्षरो को बडा किया ओर इन का रंग बदल दिया हे, अगर अब भी मुश्किल लगे तो जरुर बताये फ़िर नया टेम्प्लेट ही बदल लुगा

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दीपक said...
5 September 2008 at 6:09 PM  

भाटिया जी
आपने भी ब्रेक के बाद वाला बोर्ड लगा दिया खैर कोइ बात नही इंतजार है

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अशोक पाण्डेय said...
5 September 2008 at 7:26 PM  

अभी तक तो कहानी में सब ठीक ठाक ही लग रहा है.. देखते हैं कल क्‍या गड़बड़ होती है..

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shama said...
2 April 2009 at 11:52 AM  

Bohot dinobaad aapke blogpe aayi hun...
Boht kuchh padha...samajh nahee paa rahee ki kya likhun...khaaskar is sheershak tale",Kya mai atmhatya kar lun", jo likha gaya hai...hairan hun, ki zindageeme kabhi patni to kabhi pati, apnehi gharko narak bana dete hain...! Kitne gharon me dekh chuki hun..
Takreeban 2 maah ( aur ab bhi ye problem jaaree hai), mere netpe kaafee hacking huee...is karan any bloggers ke saath kaafee galatfehmiyan bhi huee..aap sabhi shayad aahat hue hai..tahe dilse kshama maangti hun...kisikobhi aahat karna maqsad nahee tha...mujhe khud nahi pata chal raha tha ki kya aur kyon ye sab ho raha hai...Ummeed hai, aaplog bade manse maaf zaroor kar denge...

Irshad ji kaa article padhneke baad meree ankh khuli aur kuchh tehkiqaat shuru ki...filhaal thodi rahat hai, lekin mera blog,"The light by the lonely path" gayab ho gaya...is chakkarme...!
URL badali gayi....any blogs banake, content ke anusaar unhen vibhajit kar diya hai..
Aapka behad achha sahyog aur margdarshan raha...shukrguzari kin alfazonme zahir karun?

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P Chatterjee said...
3 November 2016 at 7:12 AM  


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