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ताऊ का ईलाज केसे होगा ??

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नमस्कार आप सभी को,
अब तबीयत भी काफ़ी अच्छी हो रही है धीरे धीरे ओर अब दिल भी नही लग रहा आप सब के बिना, कल से आप सब की सेवा मै फ़िर से हाजिर रहूंगा...
लेकिन यह हमारे ताऊ जी है, इन की परेशानी कुछ अजीब सी है, अगर आप मै से कोई इन का इलाज कर सके तो बहुत अच्छा होगा, क्योकि सभी डा० इन का ईलाज करते करते माथा पकड लेते है, ओर इन्हे जेब से पेसे दे कर हाथ जोड कर वापिस भेज देते है...
तो सुने पिछले डा० साहब ओर ताऊ की कहानी...

डा,.... ताऊ जी राम राम जी की.
ताऊ मरीज... डा साहिब राम राम जी की.
डा.... ताऊ जी केसे है आप ?
ताऊ.... भई डाकदार साहब आराम कोईना आया,तबीयत घणी ज्यादा खराब हो गई.
डा.... दवाई खा ली थी ? (खाली )
ताऊ.. डाकदार साहब दवाई की शीशी तो भरी हुयी थी.
डा.... अरे ताऊ जी मेरे कहने का मतलब आप ने दवाई ले ली थी ?
ताऊ... डा साहब केसी बाते करते हो, आप ही ने तो दवाई दी थी, ओर मेने ले ली थी.
डा:::ताऊ जी आप ने दवाई पीली थी क्या ?
ताऊ...डाकदर साहब दवाई पीली नही लाल थी !
डा... ने अपना सर पकड लिया ओर बोले अबे ताऊ दावाई को पीलिया था क्या ?
ताऊ... डाकदार साहब पीलिया तो मुझे है दवाई को थोडे ही है....
डा.... अबे ताऊ मेरे कहने का मतलब तुम ने दवाई को मुंह लगा कर अपने पेट मे डाल ली थी क्या ?
ताऊ... ना डाकदर साहब ना जी.
डा.... क्यूं ?
ताऊ..क्यूं कि उस का ढक्कन जो बन्द था ?
डा... तो खोला क्यो नही ?
ताऊ...डाकदार साहब आप ने ही तो कहा था कि... शीशी का ढक्कन बन्द रखना.
डा....ताऊ तेरा इलाज मेरे पास नही
ताऊ... तो डाकदार साहब यह तो बता दो मे ठीक केसे होऊगां...

४,५,६ ओर फ़िर अन्तिम दिन...

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चोथा दिन....
सुबह करीब ५ बजे छोटी भाभी मां को देखने गई तो, उसे कुछ आजीब सा लगा, उस ने जल्दी से मुझे ओर भाई को जगाया, मेने ध्यान से मां को देखा तो आंखो मे आंसू वह रहे थे, फ़िर मेने मां के सर पर हाथ रखा जो गर्म था, तभी मेने हाथ पकडा तो बिलकुल ठंडा लगा ओर हम ने जल्दी से ड्रा को बुलाया, ड्रा जी ने कहा बस अब जो करना हो कर लो इन का अंतिम समय आ गया, ओर ड्रा जी ने एक शीशा नाक के पास लगा कर देखा था, भाभी जल्दी से एक बुजुर्ग ओरत को बुलाने चली गई जिस ने पहले भी हमारी बहुत मदद की थी, मै पहले तो बहुत घबरा गया, भाई मेरे से भी ज्यादा घबरा गया, फ़िर मेने हिम्मत कर के, अपने ऊपर काबू कर के मां को ऊठा लिया ओर भाई को जोर से कहा चल मेरी मदद कर ओर भाई ने मां के दोनो पेर पकड लिये ओर जल्द से हम ने मां को उस जगह जमीन पर लिटा दिया, जहां पिता जी ने प्राण छोडे थे, ओर मेने अपने घुटने ( गोडे) पर मां का सर रख लिया, ओर साथ मै ही दिया भी जला दिया, इतने मै वो बुजुर्ग पडोसन भी आ गई, ओर उस ने मां का मुयाना किया तो कहा कि अभी कुछ सांसे बाकी है, ओर उस बुजुर्ग ओरत ने मां के मुंह मे गंगा जल डाला ओर फ़िर हम सब गायत्री मंत्र का जाप करने लगे, कुछ देर बाद भाई ने भी अपना घुटना मां के सर के नीचे दिया, मां की आंखो मे कुछ ओर आंसू आये ओर हम सब को छोड कर चली गई.....मै तो रॊ भी नही पाया एक दम से चुप सा हो गया.

उस समय मुझे ऎसा लगा कि इस भरे संसार मै मेरे ऊपर से एक घने पेड की छाया मुझ से छीन गई.........मै भरी दोपहरी मै...... किसी धुप वाली जगह पर खडा हुं, दिल अन्दर ही अन्दर रो रहा था, लेकिन आंखो मे आंसु नही थे, फ़िर सभी जान पहचान वालो को रिशते दारो को फ़ोन किया ओर आग्रह किया कि वो भी सभी जान पहचान वालो को बता दे,फ़िर बाकी की तेयारी सब करनी शुरु कर दी, मोहल्ले वाले भी सभी इकट्टे हो गये ओर सभी लोगो ने हम दोनो भाई की मदद करनी शुरु कर दी, मुझे सभी ने बेठे रहने की इच्छा जता दी कि भाईया आप बेठे, अंकल आप बेठे

फ़िर चिता देने के बारे बात हुयी तो मेने मना कर दिया कि मै मां को चिता नही दुंगा, जिस मां ने हमे हमेशा सर्दी गरमी से बचाया मै उसे केसे चिता के हवाले कर दुं, ओर भी भाई ने इसे करने की बात मान ली, ओर बाजार से सारा समान भी ले आया, ओर अपने नाप के कपडे भी, फ़िर पंडित जी आये, ओर उन्होने कहा कि चिता तो आप ही देगे, मेरे मना करने पर पंडित जी ओर बहुत से लोगो ने मुझे समझाया तो मुझे इस कार्य के लिये तेयार होना पडा, ओर फ़िर भाई के नाप वाले कपडे ही मुझे पहनाने पडे, जो काफ़ी तंग थे, पाय्जाम तो बेठते ही फ़ट गया. फ़िर दोपहर तक सारे रिशते दार ओर जानपहचान वाले, अडोसी पडोसी इकठ्ठे हो गये, ओर हम सब मिल कर मां की अर्थी को ले कर शमशान घाट की ओर चल पडे,वहां पंडित जी ने सारी रशमे निभाई, पुजा कि ओर फ़िर मां को आखरी प्रणाम कर के उन्हे चितां दे दी, लेकिन चिता देते समय मेरा रोना फ़ुट गया लेकिन सभी साथी लोग मुझे सहारा दे रहे थे समझा रहे थे ओर फ़िर मै वहां काफ़ी देर वेठा रहा, फ़िर सभी ने मुझे अपने साथ लिया, फ़िर पंडित जी ने हम दोनो भाईयो कि तरफ़ से सब का धन्यवाद किया, ओर चाय नास्ता कर के जाने को कहा, ओर साथ ही चोथे का समय भी बता दिया, फ़िर मेरे से कुछ जरुरी पुजा करवाई ओर कुछ नगद पेसे ले कर ( दक्षिणा )ले कर अगले कार्य कर्म के बारे बता दिया, फ़िर हम सब घर वापिस आ गये, ओर आज पहली बार यह घर मुझे बेगाना लगा

लेकिन अब यह घर मुझे बेगाना सा लग रहा था, मां की हाय हाय अब भी सुनाई दे रही थी कानो मे, बेठ बेठा ऊठा कर कभी मां को पानी पिलाने के उठता, लेकिन फ़िर वापिस बेठ जाता,फ़िर चाय बगेरा सब को पिलाई, खुद भी पी..... फ़िर आगे के कार्य कर्मो के बारे मै अपने से बडॆ लोगो से राय मांगी कि क्या क्या करना होता है ? फ़िर उस के हिसाब से मेने कमर कस ली, कहां तो मुझे गर्मी बहुत लगती थी, ओर कहा मां को शांति मिले इस लिये सभी काम खुद करने लगा, पुजा के लिये समान लाना, आने जाने वालो के लिये भोजन का इंतजाम करना, चोथे के लिये हलवाई बिठना, ओर जो लोग आज आये थे उन सब के लिये खाने का इंतजाम करना, ओर चोथे तक मै खुब घुमा गर्मी मै घुमा,ओर भगवान से यही प्राथना करता था, है भगवान मुझे अभी बिमार मत करना, ....

आज रात को भी नींद नही आई, बस युही सोचता रहा मां के बारे, पिता जी के बारे, भाई के बारे, उस के बच्चो के बारे..... दिमाग फ़टने को आ गया लेकिन कुछ भी सही सोच ना पाया, किसी भी फ़ेसले पर पहुच पाना कठीन था, ओर आज मेने पहली बार सर दर्द की गोली खाई ओर कब नींद आ गई पता नही.
पांचवा दिन...
पांचवा छटा ओर बाकी दिन.....
आज के दिन बहुत से अडोसी पडोसी मिलने जुलने आये, कई रिशतेदार भी दोबारा आये, ओर फ़िर पंडित जी ने भी काफ़ी समान लिख वाया वो सब मेने खुद ही इकट्टा किया, पसीने के मारे बुरा हाल गर्मी ने भी मुझ से गिन गिन कर बदले लिये, लेकिन मेने हिम्मत नही हारी, हां अब मेने खुब सारी शिकंजबी पीनी शुरु कर दी थी, या फ़िर पानी मै नींबू डाल कर पीता था, यह पांचवा दिन भी युही बीत गया, जब भी घर से जाता तो मुंह से निकला अच्छा मां मै बाजार जा रहा हुं, लेकिन फ़िर याद आ जाता कि ......

(मुझे तो पता नही था, जिस दिन मां को चिता दी उसी दिन कुछ जल चढाने, या छींटे मारने जाना था, मां की चिता पर, लेकिन मुझे रात सोने के समय यह पता चला, तब करीब रात के बरह बज गये थे, तो मेने भाई को कहा चलो अब चल पडते है, लेकिन सब ने रोक लिया) आज शाम को मेने याद रखा, ओर शाम चार बजे मै ओर मेरे भाई का लडका मां की चिता पर जा कर पानी के छींटे मार आये, हम दोनो को पता नही था कि क्या ओर कोन सा मंत्र पढना है, बस हम ने अपनी समझ से ही मां कॊ प्रणाम किया, कुछ जल छीडकां, ओर वापिस घर आ गये...

आज भी नींद आंखो से कोसो दुर थी... पता नही कब सो गया...

तेहरवां दिन ...
आज बहुत ही जल्द मेरी आंख खुल गई,शायद चार बजे, मेने दांत साफ़ किये थोडा पानी पिया, ओर फ़िर नहाने चला गया, नह कर निकला तो , थोडी देर मै पंडित जी आ गये, राम राम करने के पश्चात मेने उन्हे सारा समान सोंपा
आज मां को गये द्स दिन हो चुके थे,फ़िर पंडित जी ने आटे के दिये मंगवये, हां सब से पहले रेता मंगवाई, कुछ रेता को फ़र्श पर डाल कर उस पर स्वास्तिक का निशान, आटे से बनाया, फ़िर कुछ लिखा, फ़िर मेरे से कई पिंड बनबाये,अब याद नही शायद २४ या फ़िर कम या ज्यादा, फ़िर दिये जलाये कुछ दियो मे कच्ची लस्सी ( दुधिया पानी ) जेसा भी भरा, फ़िर काफ़ी देर तक मंत्र पढते रहे, ढुप बत्ती भी करते रहे ओर मै उन के बाद उन के पीछे उसी मंत्र को दोहरा रहा था, फ़िर पडितं जी ने एक एक पिंड को पुजना शुरु करवाया, इन सब बातो मे काफ़ी समय लग गया, फ़िर पडित जी ने हवन करना शुरु किया,

मेने भाई को ओर उस के लडके को पहले ही समझ दिया कि हवन समाग्री एक ही स्थान पर मत डाले, ओर पडितं जी ने श्लोक पढने शुरु किये हओ हवन को अग्नि दी, लपटे खुब ऊंची उठी गर्मी तो बहुत थी, लेकिन आज इस हवन से मुझे गर्मी कम , प्यार ज्यादा मिला, ओर कई दिनो से खराब तबीयत काफ़ी हद तक ठीक हो गई, हवन भी काफ़ी देर तक चला, फ़िर पडितं जी ने आखरी मंत्र ओर शलोक पढे ओर हम सब को खडे होने का संकेत किया, फ़िर पडिंत जी ने अपनी दक्षिणा मांगी, वा अन्य समान मांगा, मेने बिना आना कानी किये, पडितं जी को उन की दक्षिणा ओर उन का समान उन्हे दे दिया, ओर पडितं जी खुशी से विदा ले कर चलेगये,
फ़िर सब ने चाय पी, को नाश्ता किया.

अब मेरे यहां के सारे काम पुरे हो गये थे, ओर रुकने का सवाल ही बाकी नही था,एक काम शुधि करण रह गया था , जो मेने पंडित जी से पुछ लिया कि क्या यह कर्म मै अपने घर जा कर कर सकता हुं ? तो पंडित जी ने कहा कि १६ दिनो के बाद इस साल मे कभी भी किसी भी दिन कर सकते हो, ओर भाई ने कहा कि भईया मै यहां कर लूंगा, लेकिन मेने कहा तुम करो लेकिन मै वहा इसे जरुर करूंगा, लेकिन आते ही पहले मै बिमार पड गया, ओर फ़िर अस्पताल चला गया, अब हम इस कर्म को यहां सितम्बर मै दुसरे सप्ताह करेगे,

मां कि अस्तिया व्यास नदी मै बहा आया था, जहां रास्ते मै मुझे वत्स शर्मा जी मिले, बिलकुल ऎसे जेसे हम पहली बार नही बल्कि कई बार पहले भी मिल चुके हो, उन्होने बहुत प्यार ओर सम्मान दिया, बहुत अपना पन दिया... बाते तो बहुत सी थी लेकिन समय की नाजुकता को देख कर उन्ह से भी भीगे मन से इजाजत लेनी पडी,

मेरी इस दुख भरी यात्रा से किसी का दिल दुखे तो माफ़ करे, बाते तो बहुत सी है लेकिन अब इस लेख को मै आज यही खत्म कर देता हुं.....
आप सभी का धन्यवाद जिन्होने मेरे इस सब लेखो को पढा, मुझे हिम्मत दी, मेरे आंसू पोछे
हां उस से अगले दिन यानि ३ सितमबर को मै सुबह सुबह भारत से चला ओर शाम ६ बजे अपने बच्चो ओर अपनी बीबी के पास था, यह सब मुझे लेने मुनिख एयर पोर्ट पर आये हुये थे

घर मै दुसरा ओर तीसरा दिन...

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घर मै दुसरा दिन...
आज सुबह चार बजे मां को देखा तो सांसे चल रही थी, ओर शरीर भी गर्म था, फ़िर कुछ समय मै लेटा तो पता नही कब नींद आ गई, जब उठा तो मां की हाय हाय सुन रही थी, शायद मां दर्द से तडप रही थी, ओर हम सब कुछ भी नही कर पा रहे थे, दवा भी तभी दे जब मां कुछ खा पी रही हो, मां ने तो एक महीने से खाना पीना छोड दिया था, बस चम्मच से ही थोडा बहुत पानी पी रही थी, वो सारा दिन भी मै मां के सिरहाने बेठा रहा, एक बार मां ने बहुत मध्दिम सी आवाज मे कहा राज तु आ गया अच्छा किया.ओर मै मां के हाथो को सहलाता रहा,कभी मुंह मे गंगा जल दे रहा था, लेकिन गंगा जल का रंग बिलकुल पीला था, यानि बहुत गंदा, लेकिन हमारी हिन्दू नीतियो के सामने कई बार ऎसे मोको पर चुप रहना पडता है,जिस समाज मै रहना है उस के साथ ताल मेल बिठाना भी जरुरी है.

फ़िर सारा दिन मिलने जुलने वाले , हाल चाल पुछने वाले आते जाते रहे, सभी से बात करते सुनते दुख बंटता गया, ओर फ़िर रात आई मै दिन मे आज कुछ सो गया था, इस लिये रात को सब ने जागने का प्रोगराम बनाया कि बारी बारी से जागे गै, ओर बाते करते करते रात के दो तीन बज गये, मां की हालात देखी नही जा रही थी, ओर मां के ठीक होने के कोई आसार नही नजर आ रहे थे बस सभी भगवान से यही प्राथना कर रहे थे कि है भगवान इन्हे अब ज्यादा मत तडपाओ, इन्हे मुक्ति देदो.....फ़िर थोडी देर के लिये सब सो गये, लेकिन थोडी सी आहट पर हम सब जाग जाते. ओर किसी तरह से यह दिन भी निकला.

अब अडोसी पडोसीयो से घर के बारे कई बातो की खुसर पुसर भी कानो मे पढने लगी, लेकिन मै मां की हालत देख कर बहुत परेशान था, ओर सब कुछ सुन कर, जान कर भी चुप रहा, जेसे कोई नालायक बेटा हो.... मां के ऊपर कितना कुछ बीता लेकिन मां ने कभी मुझे नही कहा, क्यो? यह सवाल मां से करना चाहता था ? लेकिन मां तो बोल ही नही पा रही थी, बोल मां एक बार तो बता क्या यह सब बाते जो मुझे सुनाई दे रही है सच है ? इतना बेबस कभी ना हुआ था, अगर आज मां अच्छी हालात मै होती तो... मै मां की बेज्जती का बाद्ला तभी ले लेता..... लेकिन अब मुझे भी अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था, लेकिन करुं क्या समझ मै नही आ रहा था, भाई से एक दो बार सवाल किया तो वो खामोश हो जाता... क्या करुं इस समय बस अपने आप मे ही उलझता गया, ओर सारा गुस्सा पीता गया.

लोग कहते है कि बेटा हो तो स्वर्ग मै जगह मिलती है, बेटे मां बाप की सेवा करते है, तो कोई कहता बेटी मां बाप की सेवा करती है? क्यो हम आपस मै झुठ बोलते है, सेवा बस अच्छे बच्चे ही करते है, नालायक बस दिखावा करते है, सेवा नही, नालाय्क चाहे बेटा हो या बेटी वो मां बाप की बेज्जती ही करते है, उन के पेसॊ पर ऎश तो करते है उन्हे गालियां भी निकालते है, मत मांगो अपने लिये बेटा या बेटी मांगो तो अपने लिये अच्छे बच्चे वो किसी भी रुप मै क्यो ना हो, जो कम से कम मां बाप की सेवा ना करे लेकिन उन्हे वक्त से पहले लज्जित कर के मोत के मुंह मै ना धकेले....... मेरा इन दो दिनो मे सोच सोच कर बुरा हाल हो गया था, ओर फ़िर सामने मेरे नाटक होता जेसे सब श्रवण ही थे??
पता नही कब सोचते सोचते नींद मै चला गया....................
ओर फ़िर तीसरा दिन...
मुझे सुबह जल्दी जगाने की आदत है, रात को चाहे कितनी भी देर से सोऊ, सुबह ५,३० पर मेरी आंख खुली सब सोये थे, मैने दांत साफ़ किये पानी पिया, दो तीन चम्मच पानी मां के मुंह मै डाले, आज मां अन्य दिनो से थोडी शांत थी, मेने मां को बुलाया तो मां थोडा गरदन को हिलाया, फ़िर मेने मां के सर पर हाथ फ़ेरा, लग रहा था कि आज मां को दर्द कम होगी फ़िर १०,१५ मिंट मै बाहर घुम आया, ओर फ़िर आ कर मां के पास बेठ गया, आज मां से मेने अपने दोनो बेटो की आवाज भी मां के कानो तक मोबाईल से पहुचाई, पता नही मां मै कहां से हिम्मत आई कि बिलकुल साफ़ शब्दो मे अपने पोतो का नाम पुकारा, फ़िर एक शांति सी छा गई, फ़िर सारा दिन आने जाने वालो का तांता लगा रहा, मां की जान पहचान बहुत थी, क्योकि सभी के दुख को मां अपना दुख समझती थी, सभी को नेक सलाह देन, मदद देना मां का पहला काम था, ओर मां को देख कर सभी यही कहते है कि है भगवान तु यह केसी बेइंसाफ़ी कर रहा है, जो ओरत आज तक सब के दुख बांटती रही, अपना पराया ना देख कए सब की मदद करती रही तु उस के साथ यह सब क्यो कर रहा है??

अब सारा दिन मां के सिरहाने बेठा रहता, कभी कभी भाई से मां के बारे पुछता तो सही जबाब ना मिलता, मां की कोई आखरी इच्छा जो मां ने कभी बताई हो, लेकिन भाई हर बात को टाल जाता, दवा के बारे पूछता तो कभी कोई जबाब तो कभी कोई जबाब, फ़िर मेने डा के पास लेजाना चाहा तो हमारे मित्र डा जी ने साफ़ मना कर दिया कि इन्हे लेजाना बेकार है, अब इन्हे आराम से यही रहने दे, मै सारा दिन मां के सिरहाने बेठा रहता, ओर हार आने जाने वाले से मां की एक एक बात जानना चाहता, भगवान से यही कहता है भगवान एक बार सिर्फ़ एक बार मां मेरे से कोई भी बात कर ले बस एक बार.......मेरी मां मुझ से बात कर ले, मै मां से उस की आखरी इच्छा ही पुछ लुं....

मै मां के पास बेठा रहता था, ओर मां का हाथ थोडी थोडी देर बाद पकड लेता, ओर आज की रात मां का हाथ थोडा ठंडा लगा, लेकिन सभी कहे नही गर्म है, लेकिन बार बार जब भी मां के हाथ पांव छुता तो मुझे थोडे ठंडे लगे..मेने सब को कह दिया कि आज की रात कुछ होने वाला है, रात बारी बारी से जागने की सलाह बनी... लेकिन आज फ़िर रात का एक बज गया, फ़िर सभी लोग धीरे धीरे अपने घर चलेगे,युही कब रात के तीन बज गये पता ही नही चला, हम सब भी थोडी देर के लिये लेटे तो पता नही कब आंख लग गई ( नींद आ गई ) लेकिन पिछले दिनो की तरह से ही थोडी सी आहट पर भी मै झट से उठ बेठता, कब रात गुजर गई पता ही ना चला...

मैं कहता हूं कि आप अपनी भाषा में बोलें, अपनी भाषा में लिखें।उनको गरज होगी तो वे हमारी बात सुनेंगे। मैं अपनी बात अपनी भाषा में कहूंगा।*जिसको गरज होगी वह सुनेगा। आप इस प्रतिज्ञा के साथ काम करेंगे तो हिंदी भाषा का दर्जा बढ़ेगा। महात्मा गांधी अंग्रेजी का माध्यम भारतीयों की शिक्षा में सबसे बड़ा कठिन विघ्न है।...सभ्य संसार के किसी भी जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"महामना मदनमोहन मालवीय