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दादी मां.

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एक बार दादी मां का अपनी बेटी के घर आना हुआ, अब दो दिन रह कर दादी मां अपने घर रोहतक जाने के लिये तेयार हुयी, बच्चो के पास समय नही था इस ९० साल की बुढिया दादी मां के लिये, ओर दादी मां दिल्ली से रोहतक के लिये चली......
दादी मां को उस की बेटी ओर दामाद दिल्ली बस अड्डे पर रोहतक की बस मे बिठा कर ओर टिकट वगेरा ले कर देदी ओर समझा दिया की रोहतक पहुचते ही आप का बेटा आप कॊ बस मे से उतार लेगा आप बेफ़िकर हो कर बस मे बेठना, बाकी कई ओर बाते समझाई, राम राम , पेरी पोना हुआ ओर बस रोहतक के लिये चल पडी...... अभी बस को चले थोडी देर हुयी कि बस रुकी, दादी कंडेकट्र से बोली, बेटा बाहदुर गढ आ गया क्या( यह बाहदुर गढ दिल्ली ओर रोहतक के बीच मे हे) तो कंडॆकट्र बोला अम्मा अभी नही आया, बस चली थोडी देर बाद सवारी लेने के लिये फ़िर रुकी,दादी ने फ़िर से पुछा बेटा बहादुर गढ आ गया, कंडेकट्र बोला नही मां जी अभी नही.
यु कई बार हुआ, ओर अब कंडेकट्र को थोडा गुस्सा आ गया, एक बार फ़िर बस रुकी दादी फ़िर से बोली बेटा अब तो लगता हे बहादुर गध आ ही गया, तो कंडेकट्र गुस्से से बोला मां तु चुपचाप बेठ जा जब भी पेसे का हिसाब करने लगता हु तु बोल पडती हे,ओर मेरा सारा हिसाब किताब खराब हो जाता हे,जब भी बहादुर गढ आया तो बता दुगां , अब मत बोलना,दादी मां थोडी सहम गई ओर उस की आंखॊ मे दो आंसु आगये.
ओर अन्य लोगो ने कंडेकट्र कॊ उस की बतमीजि पर गुस्सा किया, कब बहादुर गढ आया कब निकल गया पता ही नही चला सब लोग मस्त थे, आगे संपला आगया तो कडेकट्र को याद आया अरे इस बुढिया को तो बहादुर गढ उतरना था, अगर किसी भी यात्री को याद आ गया तो मेरी पिटाई हो जायेगी,
ओर कंडेकट्र ने ड्राईवर से बात की ओर बस वापिस मोड ली, बहादुर गढ पहुच कर कंडेकट्र बोला अम्मा बहादुर गढ आ गया !!!! दादी बोली अच्छी बात हे बेटा यह ले गिलास ओर पानी का भर ला मेरी बेटी ने कहा था जब बहादुर गढ आ जाये तो यह गोली खा लेना....
ओर अब कंडेकट्र अपना सर पकड कर बेठ गया........ :)-

हमारा तिरंगा झंडा कब बना ओर किस ने चुना इस का रंग

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बात बहुत पुरानी हे, एक बार राजा राम मोहन राय जी इग्लैंड जा रहे थे, रास्ते मे उन्होने ने फ़्रांस का शिप देखा जिस पर एक तिरंगा फ़्रांस का लहरा रहा था, यह बात हे करीब १८३१ की, ओर १८५७ मे भारत मे क्रन्ति हुयी ओर जनता मे आजादी के मतवाले झुम उठे, ओर फ़िर यह तिरंगा तब से चला, लेकिन समय के साथ साथ इस मे कई तब्दीलीया होती रही,
ओर फ़िर स्वदेशी अन्दोलन ने जोर पकडा तो एक राष्ट्रीया धवज की जरुरत पडी,तो स्वामी विवेकानन्द जी की शिष्या निवोदिता जी ने इस झण्डे की परिकल्पना की, ओर ७ अगस्त १९०६ को कोलकता मे एक रेली मे बंगाल के विभाजन के बिरोध मे इसे लहराया गया।
ओर फ़िर इस मे काफ़ी परिवर्तन हुये , ओर भारत मे एक धव्ज समिति का गठन किया गया, जिस के अध्यक्ष डाक्टर राजेंद्र प्रसाद जी थे, ओर एक बेठक मे यह तह किया गया कि राष्ट धव्ज के रुप मे एक तिरंगा कुछ हो, ओर उस मे आशोक चक्र बीच मे हो, ओर कुछ चरचा ओर परिवर्तनो के बाद आज के तिरंगे का फ़ेसला हुआ, जो आज हमारे सामने हे

गोल गपे

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बीबी अपने पति से, एक बात बोलू मारोगे तो नही.....
पति , अरे केसी बात करती हॊ बोलो...
बीबी, मै मां बनाने वाली हूं.....
पति, अरे इस मे मारने वाली क्या बात हे यह तो खुशी की बात हे....
बीबी, हां लेकिन एक बार जब मे कालिज मे थी ओर यह बात पापा को बोली थी तो....पापा ने बहुत मारा था।
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ताऊ, बचपन मे मां की बात सुनी होती तो .... यह दिन ना देखना पडता!!!!!
तिवारी, क्या कहती थी तुम्हारी मां ???
ताऊ, अरे बाउली बुच जब बात सुनी ही नही तो मुझे क्या पता मां क्या कहती थी।
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बीबी , सुनो जी ड्रा० ने मुझे एक महीना किसी हिल स्टेशन पर जाने को कहा हे, पुरा एक महीना....ओर हम कहा जायेगे ?
पति, दुसरे ड्रा० के पास।
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संता होटल मे जा कर एक मच्छ्ली खाने के लिये आर्डर करता हे, थोडी देर मे वेयर आता हे... सर आप फ़ेंच मच्छी लेगे या स्पेनिश ??
संता, ओये यार कोई सी भी ले आ मेने कोन सी उस से बातें करनी हे.

मैं कहता हूं कि आप अपनी भाषा में बोलें, अपनी भाषा में लिखें।उनको गरज होगी तो वे हमारी बात सुनेंगे। मैं अपनी बात अपनी भाषा में कहूंगा।*जिसको गरज होगी वह सुनेगा। आप इस प्रतिज्ञा के साथ काम करेंगे तो हिंदी भाषा का दर्जा बढ़ेगा। महात्मा गांधी अंग्रेजी का माध्यम भारतीयों की शिक्षा में सबसे बड़ा कठिन विघ्न है।...सभ्य संसार के किसी भी जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"महामना मदनमोहन मालवीय