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छि छि...

.


केसे केसे दिवाने?????

10 टिपण्णी:
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Arvind Mishra said...
23 January 2009 at 2:14 am  

छिः छिः क्यों यह तो सहज मानवीय जुगुप्सा है !

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ताऊ रामपुरिया said...
23 January 2009 at 3:45 am  

यो मेरा मट्टा के देखण लाग रया सै?

रामराम.

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Anonymous said...
23 January 2009 at 4:15 am  

ऐसे ऐसे ही दिवाने, वरना नही पड़ते ये कपड़े खुलवाने...

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P.N. Subramanian said...
23 January 2009 at 4:45 am  

Maa tujhe pranam

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संजय बेंगाणी said...
23 January 2009 at 6:58 am  

इतनी ही छी छी थी तो यहाँ छापी ही क्यों?

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ss said...
23 January 2009 at 7:01 am  

होता है चलता है दुनिया है|

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Vinay said...
23 January 2009 at 11:53 am  

मन क्यों बहका रे बहका?

---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें

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Unknown said...
23 January 2009 at 4:44 pm  

IS CHITRA MAI KOI KHARAAB BHAAV NAHE HAI. AGLAA SHRADHHA KE SAATH NIHAAR RAHAA HAI. LEKIN AAP ISE KAHAAN SE KYU LAAYE HAI JEE. DUNIYAA MAI BAHUT KUCHH BAHUT TARAH SE HOTAA RAHTAA HAI

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सचिन मिश्रा said...
23 January 2009 at 10:05 pm  

अब इन्हें क्या कहूँ...?

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Prakash Badal said...
26 January 2009 at 9:59 pm  

कोई देख लेगा राज भाई??

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